शेयर बाज़ार में धोखे व फ्रॉड का खेल चलता रहता है। इसका गुब्बारा फुलाने के पीछे किसी न किसी ताकतवर खिलाड़ी/संस्था का हाथ रहता है। ऐसे कई किस्से वॉल स्ट्रीट से लेकर दलाल स्ट्रीट तक बिखरे पड़े हैं। इसलिए हमारे लिए सबसे अच्छी रणनीति यह है कि बाज़ार के उन्माद का शिकार होने के बजाय शांत भाव से अच्छा धंधा कर रही संभावनामय कंपनियों में 5-10 साल के लिए निवेश करे। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

निवेशकों की नई लहर आती रहती है। इस वक्त नौकरीपेशा लोग, खासकर आईटी क्षेत्र के बंदे वर्क-टू-होम के दौरान बड़ी तेज़ी से शेयर बाज़ार की तरफ उमड़े हैं। लेकिन हो सकता है कि अक्टूबर-नवंबर में कोरोना का दूसरा झटका लगने के बाद ये सभी गायब हो जाएं। पिछले घोटालों ने निवेशकों की लहरें सोख लीं। अब बाज़ार का कड़वा सच ताज़ा लहर को ले डूबेगा। बचे रह जाएंगे वही ढाक के तीन पात। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

नब्बे के दशक में छोटे दुकानदार व बेरोजगार शेयर बाज़ार में झूमकर उतरे थे। हर्षद मेहता की कलाकारी में उन्होंने धन भी खूब कमाया। लेकिन हर्षद मेहता का भांडा फूटते ही उनकी सारी कमाई स्वाहा हो गई। वे ऐसे बरबाद हुए कि दोबारा शेयर बाज़ार का रुख नहीं किया। उसके कुछ साल बाद पब्लिक इश्यू का जुनून चढ़ा। तब कुकुरमुत्तों की तरह उगी हज़ारों कंपनियां मासूम निवेशकों से करोड़ों जुटाकर चम्पत हो गईं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

कहने को अपने यहां निवेशक संरक्षण कोष हैं। ये कोष स्टॉक एक्सचेंजों के पास हैं। साथ ही कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के अधीन अलग से निवेशक शिक्षा व संरक्षण कोष बना हुआ है। मगर सच्चाई यह है कि शेयर बाज़ार का मारा निवेशक सेबी और स्टॉक एक्सचेजों के दरवाजों पर सिर पटकता रह जाता है। यही वजह है कि तीन दशकों से निजी निवेशकों की संख्या आबादी के लगभग 2% पर अटकी पड़ी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

देश में कोरोना शहरों ही नहीं, गांवों तक फैला है। एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट तो यहां तक कहती है कि अब ग्रामीण जिले कोविड-19 के नए हॉटस्पॉट बन गए हैं और नए संक्रमण में उनका हिस्सा 50 प्रतिशत से ज्यादा हो गया है। फिर भी चालू वित्त वर्ष 2020-21 की जून या पहली तिमाही में कृषि व संबंधित क्षेत्र के आर्थिक विकास की गति 3.4 प्रतिशत रही है, जबकि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था इस दौरान 23.9 प्रतिशत घटऔरऔर भी