विदेशी संस्थागत निवेशकों ने अगले 12-24 महीनों में ज्यादा रिटर्न की शीर्ष सूची में चीन के साथ भारत को भी रखा है। उनके मुताबिक भारतीय शेयर बाज़ार दुनिया के सबसे ज्यादा बढ़ सकने वाले बाज़ारों में शुमार है। वे भारत की अर्थव्यवस्था के उद्धार के लिए नहीं आ रहे। उनका सीधा मकसद यहां बन रहे मूल्य से मुनाफा खींचना है। वे अंधा सटोरिया निवेश नहीं करते, बल्कि मूल्यवान कपनियों पर दांव लगाते हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

भारतीय अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है। पहली तिमाही में जीडीपी के 23.9% घटने पर भी विदेशी निवेशक संस्थाओं ने हमारे शेयर बाज़ार में निवेश ज्यादा नहीं घटाया। बीते महीने उन्होंने कैश सेगमेंट में करीब 15,750 करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश किया। अगर ऋण बाज़ार को भी जोड़ दें तो अगस्त में उनका कुल निवेश 6 अरब डॉलर (≈ 45,000 करोड़ रुपए) का रहा है। वे एशिया में चीन व भारत में निवेश बढ़ा रहे हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार के बारे में खास जानने की बात है कि यहां देशी निवेशक संस्थाएं हमेशा रक्षात्मक रहती हैं। वे कभी-कभार ही आक्रामक होती हैं। दूसरी तरफ विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक या विदेशी निवेशक संस्थाएं हमेशा ही आक्रामक रहती हैं। ये एफआईआई आज हमारे बाज़ार की दशा-दिशा तय करने के सबसे अहम कारक हैं। उनके डॉलर आने से बाज़ार चढ़ता है। इससे रुपया मजबूत होता है तो वे ज्यादा डॉलर कमा लेते हैं। अब बुद्ध की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में खरीदनेवाले कौन हैं, इससे भी बहुत फर्क पड़ता है। रिटेल की खरीद समुंदर में एक लोटा या बाल्टी पानी के बराबर होती है। सौ सुनार की, एक लोहार की। बाज़ार में बल्क/ब्लॉक खरीद तो जगजाहिर हो जाती है और वह खटाक से एक-दो दिन में निपट जाती है। लेकिन इनसे अलग प्रोफेशनल व सस्थागत निवेशकों की खरीद होती है जो खास दिशा पकड़कर बराबर चलती है। इसकी परख ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

यूं तो हर दिन बाज़ार में खरीदे और बेचे गए शेयरों की संख्या बराबर होती है। लेकिन खरीदने और बेचनवालों की संख्या भिन्न हो सकती है। इसमें भी अगर खरीदने का जोर ज्यादा तो शेयर के भाव बढ़ते हैं और बेचने का ज़ोर ज्यादा तो शेयर गिरते हैं। खरीदनेवालों की ज़मात किस दिन, किस ओर मुड़ जाए, पहले से इसका कोई पता नहीं रहता। वे ज्यादा मुनाफे के मौके सूंघते फिरते रहते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी