समूचे शेयर बाज़ार या किसी खास शेयर की भावी चाल के बारे में कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं। न्यूटन जैसे वैज्ञानिक, शोल्स जैसे नोबेल विजेता अर्थशास्त्री और बेहद विकसित कंप्यूटर अल्गोरिदम भी यह अनुमान लगाने में मात खा चुके हैं। इसलिए मानकर चलें कि कोई भी अनुमान गलत साबित हो सकता है। यह शेयर बाज़ार में निवेश का अंतर्निहित रिस्क है जिसे भलीभांति समझकर ही इसमें धन लगाना चाहिए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

अभी तक व्यवस्था थी कि जब तक खरीदे गए शेयर आपके डीमैट खाते में नहीं आते, तब तक आप उन्हें बेच नहीं सकते थे। लेकिन नई व्यवस्था में अगले ही दिन उन्हें बेच सकते हैं, भले ही वो डीमैट खाते में नहीं आए हों। कुछ ब्रोकर सहूलियत दे रहे हैं कि शेयर-बिक्री की रकम आपके खाते में न आने पर भी आप उससे कैश या डेरिवेटिव सेगमेंट में नई पोजिशन ले सकते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

उधर आम निवेशक इस बात से परेशान हैं कि शेयर बेचने पर उनसे मार्जिन क्यों लिया जा रहा है। आखिर ब्रोकर के पास पावर ऑफ एटॉर्नी है। वह कोई रिस्क नहीं उठाता, न उसके डिफॉल्ट की गुंजाइश है। इधर, इंट्रा-डे ट्रेडर भी सेबी के नए नियम से दुखी हैं। अभी तक ब्रोकर उन्हें इंट्रा-डे अर्जित लाभ पर उसी दिन नई पोजिशन लेने की इजाज़त दे देता था। लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

सब धान बाइस पसेरी तौलना पुरानी कहावत है। लेकिन सेबी ने कैश सेगमेंट की मार्जिन ट्रेडिंग में कुछ ऐसा ही नियम बनाया है। चाहे नए शेयर खरीदें या पोर्टफोलियो के पुराने शेयर बेचें, दोनों ही हालत में आपको मूल्य का 20% हिस्सा शुरूआत में बतौर मार्जिन दे देना होगा। खरीदने पर मार्जिन देने की बात समझ में आती है। लेकिन जब हम शेयर बेच रहे हैं, तब मार्जिन जमा करने का क्या तुक! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

गिरवी रखे शेयरों की नई प्रक्रिया के बारे में आपके ब्रोकर ने सारा ब्योरा आपको बता दिया होगा। ओटीपी से पुष्टि करने पर ही आपके शेयर ब्रोकर के खाते में जाएंगे। अन्यथा आपके डीमैट खाते में पड़े रहेंगे। असली मसला है कैश सेगमेंट में मार्जिन ट्रेडिंग के नए नियम। ब्रोकर इनका विरोध कर चुके हैं। अब कुछ ट्रेडरों का भी कहना कि सेबी ने इन्हें आसान बनाने के बजाय बहुत उलझा दिया है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी