शेयर बाज़ार तर्क पर नहीं, भावनाओं व संभावनाओं पर चलता है। जिसे हम तर्क समझते हैं, उसका असर तो बाज़ार चुटकियों में जज़्ब कर चुका होता है। हम उसे अपनाएं, तब तक वह उस्तादों की उंगलियों से गुजरकर टखने तक पहुंच चुका होता। लंबे समय बाद बनी लम्बी ग्रीन कैंडल देखर हमें लगता है कि अब तो खरीद आएगी और शेयर पक्का बढ़ेगा। लेकिन अगले ही दिन वह धसक जाता है। वैसे, तर्क का तथ्य अगर बाज़ारऔरऔर भी

ज़ोमैटो को पिछले तीन साल से लगातार करोड़ों का घाटा हो रहा है। लेकिन 15 दिन पहले उसका आईपीओ 76 रुपए पर आया तो 38.25 गुना सब्सक्राइब हुआ। लिस्टिंग लगभग 182% ऊपर 138 रुपए पर हुई और अब भी ज्यादा टूटा नहीं है। लेकिन दुनिया के स्तर पर देखें तो फूड डिलीवरी से लेकर जगह किराए पर देने या टैक्सी सेवा देनेवाली कंपनियों ने लिस्टिंग पर भले ही कमाल दिखाया हो, बाद में चमक फीकी पड़ गई।औरऔर भी

सप्ताह का आखिरी ट्रेडिंग दिन शुक्रवार और उसमें भी ट्रेडिग का आखिरी एक घंटा। शेयर बाजार के अनुभवी ट्रेडर बताते हैं कि इसे गहराई से परखना बड़ा महत्वपूर्ण है। वैसे तो इंट्रा-डे ट्रेडरों के लिए हर दिन की ट्रेडिंग का आखिरी घंटा बहुत अहम होता है क्योंकि उन्हें घाटा हो फायदा, सौदे काटकर निकल जाना होता है। लेकिन शुक्रवार को उनके साथ स्विंग ट्रेडर भी जुड़ जाते हैं क्योंकि वे शनिवार-रविवार को बाज़ार बंद रहने पर देश-दुनियाऔरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में जब से ऑप्शंस सौदों का साप्ताहिक सेटलमेंट होने लगा है, तब से ट्रेडरों के लिए बुधवार व गुरुवार के भाव और उनका पैटर्न बहुत अहम हो गया है। इसके घेरे में डेरिवेटिव सेगमेंट में शामिल स्टॉक्स आते हैं। एनएसई ने 160 स्टॉक्स और तीन सूचकांकों में डेरिवेटिव ट्रेडिंग की इजाज़त दे रखी है। असल में प्रोफेशनल ट्रेडरों की तरह रिटेल ट्रेडरों को भी अपना कारोबार इन्हीं स्टॉक्स तक सीमित रखना चाहिए क्योंकि इनमेंऔरऔर भी

जिन्हें भावों को पढ़ना आ गया, उनके पैटर्न को समझना आ गया, समझ लीजिए कि उन्होंने शेयर बाज़ार की आधी बाज़ी जीत ली। जिन्होंने भावों और उनके पैटर्न के पीछे सक्रिय साफ-साफ न दिखनेवाले इंसानों या उनके समूहों की शिनाख्त कर ली, समझ लीजिए कि समूचा बाज़ार उनकी मुठ्ठी में आ गया। क्या हमारे-आप जैसे रिटेल ट्रेडर पहले आधी बाज़ी जीतने और फिर बाज़ार पर पूरा अख्तियार हासिल करने की स्थिति में आ सकते हैं? यकीनन। बसऔरऔर भी