थोड़ी-सी पूंजी और बहुत सारे ख्वाब लेकर शेयर बाजार में उतरे हमारे-आप जैसे रिटेल ट्रेडर बड़ी बेचैन आत्मा होते हैं। मन में कोई स्टॉक कौंधा तो लगता है कि फटाफट खरीद लिया जाए, अन्यथा हाथ से निकल जाएगा। वहीं, जिन ट्रेडरों को घाटा लग रहा होता है, वे सुबह-सुबह सौदे से निकलकर अपना घाटा कम से कम के लिए व्यग्र रहते हैं। दरअसल, हर दिन शेयर बाज़ार के शुरुआती घंटे ऐसी ही बेचैन आत्माओं के लिए होतेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में सक्रिय शक्तियों के संतुलन और उनकी हरकतों को ठीक से समझे बगैर रिटेल ट्रेडर दलाल स्ट्रीट से सही-सलामत नहीं निकल सकता। ये शक्तियां किसी मशीन, अल्गोरिदम या कंप्यूटर सॉफ्टवेयर में नहीं, बल्कि इनके पीछे काम कर रहे इंसानों में निहित हैं। शक्तियों का संतुलन समझना है तो हमें वहां सक्रिय इंसानों के ट्रेडिंग व्यवहार व स्वभाव को बारीकी से देखना होगा। उनका पैटर्न समझना होगा। हमारी पूंजी बहुत सीमित है, जबकि उनके पास इफरातऔरऔर भी

लम्बे निवेश के बारे में तरह-तरह की धारणाएं हैं। कुछ विशेषज्ञ पांच-दस साल तो कुछ ‘खरीदो व भूल जाओ’ की बात करते हैं। लेकिन हर धारणा समय से बंधी है। समय के साथ उसकी मार या उपयोगिता मिटती रहती है। मसलन, आज के दौर में जब अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे विकसित देशों का बेहद सस्ता धन भारत जैसे उभरते देशों के शेयर बाज़ार की तरफ अंधाधुंध बह रहा है, तब बड़ी से लेकर छोटी कंपनियों तकऔरऔर भी

जीवन की तरह शेयर बाज़ार में भी कुछ शाश्वत या हमेशा के लिए नहीं होता। इंट्रा-डे वोलैटिलिटी भी धीरे-धीरे पहले की तरह सामान्य रेंज में आती जा रही है। लेकिन जब तक असामान्य है, तब तक इंड्रा-डे ट्रेडर उसका फायदा उठा सकते हैं। मगर ध्यान रहें कि ज्यादा कमाने के फेर में कहीं अपनी ट्रेडिंग पूंजी न गंवा बैठें। ट्रेडर की पूंजी ही उसका सहारा होती है। यह डूब गई तो कमाने का साधन ही खत्म होऔरऔर भी