हर्षद मेहता जैसा माहौल, पर हश्र वैसा नहीं!
सालोंसाल से कहा जाता रहा है कि शेयर बाज़ार का उन्माद जब चरम पर रहता है, तब रिटेल निवेशकों की एंट्री होती है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। टेक्नोलॉज़ी व डिजिटल मीडिया के प्रसार ने रिटेल निवेशकों की वित्तीय साक्षरता व पहल बढ़ा दी है। ऊपर से कोरोनाकाल में ‘वर्क फ्रॉम होम’ के चलते मिली फुरसत ने नौकरी कर रही युवा पीढ़ी को समझदार निवेशक बना दिया। एक सर्वे के मुताबिक बीते सवा साल में ब्रोकरोंऔरऔर भी
ट्रेड करो तो प्रोफेशनल की तरह, वरना न करो
कोई सिर उठाए शेयर बाज़ार में टिप्स या इंट्यूशन के दम पर ट्रेड करने आ जाए तो वह जेब खाली करके ही लौटेगा। यहां तो वही रिटेल ट्रेडर कामयाब होते हैं जो प्रोफेशनल की तरह ट्रेड करते हैं अपना सिस्टम बनाकर। यह सिस्टम किसी की नकल नहीं होता। टेक्निकल एनालिसिस का आधार। अधिकतम चार-पांच इंडिकेटर का इस्तेमाल। बाज़ार में सक्रिय खिलाड़ियों का पूरा आकलन। भाव कहां और क्यों रुख बदल सकते हैं, कहां पर एंट्री और कहांऔरऔर भी
जो बेकाम वो इंट्रा-डे, बाकी स्विंग या मोमेंटम!
जो लोग कहीं नौकरी या सुबह से शाम तक काम-धंधा कर रहे हैं, उनके लिए इंट्रा-डे ट्रेडिंग करना व्यावहारिक नहीं है। उन्हें तो स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेड ही करना चाहिए। स्विंग ट्रेड पांच-सात या अधिकतम दस दिन के लिए होता है। इसमें सौदा वहां पकड़ते हैं जहां से कोई स्टॉक दिशा बदल सकता है। मोमेंटम ट्रेड भावों की दिशा में या ब्रेकआउट की संभावना को देखते हुए किया जाता है और इसकी अवधि 10-20 दिन कीऔरऔर भी
सबसे ज्यादा रिस्क झेलते व्यक्तिगत निवेशक
शायद आपको नहीं पता होगा कि संस्थाओं को भारत में इंट्रा-डे ट्रेडिंग करने की इजाज़त नहीं है। इसमें केवल व्यक्तिगत निवेशक ही भाग ले सकते हैं। यह कमाल की बात है क्योंकि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में सबसे ज्यादा रिस्क है। व्यक्तिगत निवेशक सबसे ज्यादा भोले व अनजान होते हैं। फिर भी हमारी सरकार की तरफ से पूंजी बाज़ार के नियमन के लिए बनाई गई संस्था, सेबी ने केवल और केवल उन्हें ही शेयर बाज़ार के सबसेऔरऔर भी







