जिस तरह लम्बे समय में हर किसी का मरना तय है, उसी तरह लम्बे समय में अच्छे बिजनेसवाली कंपनी के शेयर का बढ़ना तय है। लेकिन सालों-साल में होनेवाली यह बढ़त दिन-प्रतिदिन के उतार-चढ़ाव में विभाजित है। सालों-साल में निवेशक कमाता है, जबकि दिन-प्रतिदिन में ट्रेडर। दोनों की मानसिकता व रणनीति अलग होती है और अलग होनी भी चाहिए। मसलन, 27 मार्च 2020 को डाबर का शेयर 385 में खरीदकर जो ट्रेडर हफ्ते भर में 445 परऔरऔर भी

अंधा भी बता सकता है कि शेयर बाज़ार आज की ग्लोबल दुनिया में अर्थव्यवस्था का आईना नहीं रह गया है। शेयरों का चढ़ना-गिरना देशी सरहदों को तोड़कर हर तरफ बह रही विदेशी पूंजी तय करने लगी है। दुनिया भर के शेयर बाज़ार कमोबेश एक लय में उठते-गिरते हैं। इससे निवेश व ट्रेडिंग का रिस्क बहुत बढ़ गया है। यही नहीं, भारतीय शेयर बाज़ार जिस तरह बेरोकटोक चढ़ता जा रहा है, उसने हमारी अर्थव्यवस्था को बेहद नाजुक स्थितिऔरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में दो करोड़ भारतीयों के ऊपर म्यूचुअल फंडों, बैंकों व बीमा कंपनियों के कुल धन पर भी भारी पड़ता है एफपीआई या एफआईआई के रूप में आ रहा विदेशियों का धन। विदेशी निवेशक इस साल जनवरी से लेकर अब तक भारतीय बाज़ार में शुद्ध रूप से लगभग 80,000 करोड़ रुपए लगा चुके हैं। उनके लिए भारतीय शेयर बाज़ार सोने का अंडा देनेवाली मुर्गी है। मुनाफा कमाने के लिए भारत जैसे बाज़ार में आए हैंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार हर तर्क को धता बताते हुए बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि धन के प्रवाह का तर्क उसके साथ है। देश में 80% लोगों के पास खाने को अनाज नहीं है तो सरकार को उन्हें हमारे टैक्स से हर माह पांच किलो राशन मुफ्त देना पड़ रहा है। कोविड में कम से कम ढाई-तीन करोड़ लोगों को रोज़ी-रोज़गार से हाथ धोना पड़ा है। अब बचते हैं करीब 25 करोड़ लोग। इसमें से भी करीब 15औरऔर भी

साफ है कि ये रिटेल श्रेणी के ट्रेडर और निवेशक ही हो सकते हैं जो फटाफट कमाने की लालच में खरीद रहे हैं जिससे बाज़ार कम वोल्यूम में भी चढ़ा जा रहा है। उसी तरह जैसे छिछले पानी में जमकर छपाक-छपाक होता है। सवाल उठता है कि जब कोरोना काल के डेढ़ साल में करोड़ों लोगों का रोज़ी-रोज़गार चौपट हो गया, तब कौन-से ‘रिटेल’ लोग हैं जिनके पास इतना इफरात धन आ गया है? गौतम अडानी कीऔरऔर भी