नए-नए बच्चे बस इतना देख रहे हैं कि एक बिटकॉयन 42 लाख रुपए और 56,000 डॉलर से ज्यादा का है। एक-एक दिन की ट्रेडिंग में लाखों का वारा-न्यारा। वे नहीं समझना चाहते कि कंप्यूटर साइंस व टेक्नोलॉजी के महारथी बिटकॉयन से लेकर दूसरी क्रिप्टो करेंसी की माइनिंग करते हैं। सामान्य लोग यह काम नहीं कर सकते। फिर ये लोग जो मुद्रा पैदा करते हैं, दूसरे उसमें ट्रेड करते हैं। दुनिया भर में प्रचार और विज्ञापन से इनकीऔरऔर भी

दुनिया के वित्तीय बाज़ारों में तेज़ी का उन्माद क्या अब बुलबुला बनकर फूटने की स्थिति में आ गया है? दुनिया के सफलतम निवेशक वॉरेन बफेट के सहयोगी चार्ली मुंगेर का कहना है कि इस वक्त शेयर बाज़ार में करीब दो दशक पहले के डॉटकॉम बूम से भी ज्यादा पागलपन सवार है। यह पागलपन अब स्टॉक्स के बाहर क्रिप्टो तक फैल चुका है, जिसे कुछ लोग अब करेंसी कहने से बचने लगे हैं। मुंगेर का कहना है किऔरऔर भी

लम्बे निवेश के लिए शेयर बाज़ार से कंपनियों को चुनना बड़ी टेढ़ी खीर है। देखना पड़ता है कि कंपनी कर्ज में तो नहीं डूबी, उसके धंधे में बरक्कत की कितनी गुंजाइश है, प्रवर्तकों का मालिकाना कितना है आदि-इत्यादि। लेकिन हम केवल एक मापदंड पर कस लें तो कंपनी चुनना आसान हो जाता है। यह मापदंड है कि वह लगाई गई पूंजी पर कितना रिटर्न (RoCE) कमा रही है। देश में पूंजी की लागत जितनी हो. मतलब वास्तविकऔरऔर भी

अपना शेयर बाज़ार गिरते-गिरते संभल जा रहा है। हालाकि देर-सबेर उसका गिरना तय है। लेकिन अहम सवाल है कि गिरा तो कहां तक गिर सकता है? जानकार कहते हैं कि निफ्टी-50 अगर अपने शिखर से 20% गिर जाए यानी 15,000 से नीचे पहुंच जाए तो कोई अचम्भा नहीं करना चाहिए। दरअसल 20% गिरना बाज़ार के तेज़ी से मंदी के दौर में चले जाने की सर्वमान्य परिभाषा है। अभी तो नकारात्मक खबर भी सकारात्मक असर दिखा जाती है,औरऔर भी