सारे लक्षण यही हैं कि नए साल में महंगाई, खासकर खाद्य मुद्रास्फीति में उछाल आ सकता है। समस्या यह भी है जिन देशों के पास खाद्य वस्तुओं की अच्छी उपलब्धता है, वे भी मुंद्रास्फीति से लड़ने की भावी योजना बनाते हुए उनका निर्यात करने से बच रहे हैं। ऐसे में हर देश को खाद्य मुद्रास्फीति से अकेले-अकेले निपटना होगा। यह सबसे लिए बड़ी कठिन चुनौती है। यह कितनी गंभीर हो सकती है, इसका अंदाज़ा संयुक्त राष्ट्र सेऔरऔर भी

संकट तब से सुलग रहा है, जब से मार्च 2020 में कोरोना से निपटने के लिए देश में लॉकडाउन लगा। मजदूर विस्थापित हो गए। जो गांव लौटे, वे वापस लौटे तो सही। मगर इधर-उधर बिखर गए। सप्लाई की कड़ियां टूट गईं। फिर पेट्रोल-डीजल के दाम। कच्चे माल से लेकर ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ती गई। इसके ऊपर से ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु में असंतुलन से उपजी विकराल समस्याएं। मसलन, अमेरिका के जंगलों में लगी आग। इससे कैलिफोर्निया वऔरऔर भी

दुनिया भर में चरम पर पहुंचती मुद्रास्फीति ने सरकारों को ही नहीं, इन्वेस्टमेंट बैंकरो, वित्तीय बाजार के ट्रेडरों और केंद्रीय बैंकरों तक को परेशान कर रखा है। इसमें भी सबसे खतरनाक है खाद्य मुद्रास्फीति का बेहिसाब बढ़ने जाना। खाना-पीना एक ऐसी चीज़ है जिसमें मुद्रास्फीति से उसकी मांग या खपत नहीं घटती। बेहद गरीब लोगों को छोड़ दें तो बाकी लोग खाने-पीने में कटौती नहीं कर पाते। इस पर बढ़े खर्च की भरपाई वे अन्य चीजों कीऔरऔर भी

विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से निकल रहे हैं। उनके निकलने से सिस्टम में डॉलर घट गए तो डॉलर का भाव रुपए में बढ़ गया। दिसंबर तिमाही में विदेशी निवेशकों ने 4.2 अबर डॉलर यहां से निकाले हैं। इससे हमारा रुपया 1.9% खोखला हो गया। समूचे एशिया में सबसे ज्यादा मार रुपए पर पड़ी है। विदेशियों के इस तरह निकलने से बीएसई सेंसेक्स 19 अक्टूबर के शिखर से 10% से ज्यादा गिरने के बाद अब जाकर थोड़ाऔरऔर भी

जी हां! महंगाई का हाहाकार। भारत ही नहीं, सारी दुनिया में। लगता है कि नए साल का केंद्रीय थीम बनने जा रही है महंगाई या मुद्रास्फीति। अमेरिका में जहां रिटेल मुद्रास्फीति की दर अमूमन 2-2.5% से ऊपर नहीं जाती थी, वहां 6.8% हो चुकी है। यूरोप में यह दर 4.9% चल रही है जो यूरो अपनाने के बाद के दो दशकों का सर्वोच्च स्तर है। अपने यहां रिटेल मुद्रास्फीति नवंबर में भले ही 4.91% रही है, लेकिनऔरऔर भी