अमेरिका का केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व अगर नवंबर-मध्य से बांड खरीदने की रफ्तार धीमी कर देता है तो इसका क्या असर पड़ेगा? इससे पहले उसने मई 2013 में जब बांड खरीद घटाने या टैपरिंग की घोषणा की थी तो बाज़ार में अचानक ब्याज दरें बढ़ने लगीं। सरकारी बांडों पर यील्ड की दर बढ़ गई। उसने जब टैपरिंग की पूरी योजना पेश की, तब तो बांड के मूल्य इतना घट गए कि उनकी यील्ड काफी बढ़ गई। अमेरिकीऔरऔर भी

सिस्टम में धन का प्रवाह बढ़ने से ब्याज दर घटने लगती हैं। इससे जहां उद्योग, व्यापार व उपभोक्ताओं को सहूलियत हो जाती है, वहीं जिनके पास सीमित पूंजी है और जो एफडी या बांड जैसे ऋण-प्रपत्रों पर मिलनेवाले ब्याज की आय पर निर्भर हैं, उनके लिए मुश्किल हो जाती है। वे ज्यादा रिटर्न पाने के लिए रिस्की निवेश माध्यमों की तरफ जाने को मजबूर हो जाते हैं। यही वजह है कि अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे विकसितऔरऔर भी

किसी भी देश का केंद्रीय बैंक सरकारी बांड व प्रतिभूतियां खरीदता है तो सिस्टम में धन का प्रवाह बढ़ जाता है और धन की लागत या ब्याज दर घट जाती है। उद्योग व व्यापार जगत इसका लाभ उठाते हैं। अमेरिका ही नहीं, यूरोप व जापान तक ऐसा हो चुका है। अपने यहां भी रिजर्व बैंक से सिस्टम में धन का प्रवाह बढ़ाने की मांग होती रही है। इसमें केंद्रीय बैंक को नोट नहीं छापने पड़ते, बल्कि बढ़ीऔरऔर भी

अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने साफ कर दिया है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को मदद करने के लिए बाज़ार से बांड खरीदकर सिस्टम में डॉलर डालने का सिलसिला इसी नवंबर के दूसरे हफ्ते से धीमा कर सकता है। जब से कोरोना की महामारी का झटका लगा है, तभी से वह हर महीने बाज़ार से 80 अरब डॉलर के ट्रेजरी बिल और 40 अरब डॉलर के मोर्टगेज बैक्ड सिक्यूरिटीज (एमबीएस) खरीदकर सिस्टम में धन डालता रहाऔरऔर भी

फाइनेंस की दुनिया का सरगना, सरताज़ और शहंशाह है अमेरिका। वहां की हर हरकत से दुनिया भर के वित्तीय बाजार प्रभावित होते हैं। साल 2008 में लेहमान ब्रदर्स से पैदा हुआ संकट समूची दुनिया का संकट बन गया। भारतीय शेयर बाज़ार में सबसे ज्यादा धन अमेरिका से ही आता है। यह अलग बात है कि टैक्स से बचने कि लिए उसका बड़ा हिस्सा मॉरीशस और सिंगापुर में फर्म बनाकर लाया जाता है। देश में जब घरेलू बचतऔरऔर भी