अमेरिकी सरकार के बांड दुनिया में सबसे सुरक्षित माने जाते हैं क्योंकि उनमें डिफॉल्ट का रिस्क शून्य होता है। इन बांडों पर ब्याज दर बढ़ते ही निवेशक शेयर बाजार जैसे सबसे ज्यादा रिस्क वाले माध्यम से निकलकर इनकी तरफ भागते हैं। बांड में ज्यादा निवेश का मतलब अमेरिकी सरकार पर ऋण का बढ़ते जाना। इससे निवेश का तो नहीं, लेकिन सिस्टम का रिस्क बढ़ जाता है। इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस के मुताबिक दुनिया भर में चढ़े ऋणऔरऔर भी

अमेरिका में बांड की कम खरीद से ब्याज दरें और ज्यादा बढ़ने लगेंगी। वहां के दस साल के सरकारी बांडों पर यील्ड की दर इस साल पहले ही 0.9% से बढ़कर 1.69% हो चुकी है। जब एफपीआई हमारे बांडों व स्टॉक्स से निकलने लगेंगे तो हमारा विदेशी मुद्रा भंडार हल्का होने लगेगा। तब पता चलेगा कि हम जिस भंडार पर इतरा रहे हैं, वह दरअसल रेत के रेगिस्तानी टीले जैसा है। वैसे भी इधर केंद्र सरकार केऔरऔर भी

विदेशी निवेश खासकर, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई / एफआईआई) का शुद्ध मकसद भारत जैसे देशों के वित्तीय बाज़ार से झटपट ज्यादा कमाकर फुर्र हो जाना है। वे कतई इसकी परवाह नहीं करते कि उनके अचानक निकल जाने से उस देश के वित्तीय बाज़ार और खासकर उसकी मुद्रा पर कितना प्रतिकूल असर पड़ेगा। पिछली बार अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने दिसंबर 2013 में 85 अरब डॉलर के बजाय 75 अरब डॉलर के बांड खरीदने शुरू किए।औरऔर भी

इस साल 1 अप्रैल से 8 अक्टूबर तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6253.2 करोड़ डॉलर बढ़ा है। इसमें से खालिश विदेशी मुद्रा 4030.8 करोड़ डॉलर है जिसमें से 483.20 करोड़ डॉलर (11.99%) विदेशी पोर्टफोलियो निवेश है जो बांड या शेयर बाज़ार में लगा है। जो लोग देश में विदेशी मुद्रा भंडार के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने को बड़ी उपलब्ध बताते हैं, उन्हें जानना चाहिए कि घरेलू बचत में आ रही भारी कमी को विदेश से आयाऔरऔर भी

जो कोई शेयर बाज़ार में तीन साल से ज्यादा वक्त का लम्बा निवेश करना चाहता है, उसे यही नहीं देखना चाहिए कि कंपनी अच्छी व संभावनामय हो, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उसका शेयर सस्ता हो। अन्यथा, अच्छी से अच्छी कंपनी ज्यादा भाव पर खरीद लो तो बाद में पछताना पड़ता है। इस तरह पछताने से अच्छा है कि अभी उसके शेयर को गिरकर माकूल रेंज में आने दिया जाए। मान लो कि गिरकर सही रेंजऔरऔर भी