मूर्ति गई पीछे, अब नोटों में लकदक हैं लक्ष्मी
विनिमय मूल्य शुरुआत में वस्तुओं में निहित था। पांच-छह दशक पहले तक अपने यहां सामान्य किसान बाज़ार में अनाज देकर हल्दी, नमक व साबुन वगैरह लिया करते थे। लेकिन धीरे-धीरे विनिमय का माध्यम मुद्राएं बनने लगीं। मुद्राएं चूंकि संप्रभु होती हैं, देश की सीमाओं में चलती हैं बाहर नहीं तो उन पर सरकारी तंत्र का नियंत्रण बना। देशों का आपसी व्यापार बढता गया तो बाज़ार में मुद्राओं की आपसी विनिमय दर तय होने लगी। मुद्रास्फीति से देशऔरऔर भी
उपयोग से विनिमय मूल्य तक बदली हैं लक्ष्मी
घर में लक्ष्मी, खाते में धन, पर्स में नोट और धंधे में शुभलाभ लाने के दिन आ गए। दीपावली का त्योहार आ गया। लेकिन लक्ष्मी तो माया हैं और धन छाया। अच्छे-खासे कड़कते नोट कैसे महज कागज के टुकड़े बनकर रह जाते हैं, यह सच्चाई पांच साल पहले नोटबंदी समूचे भारत को दिखा चुकी है। दरअसल जिस लक्ष्मी, जिस धन को हम अपने पास लाना चाहते हैं, उसकी मूल धारणा को हमें समझना होगा। हज़ारों साल पहलेऔरऔर भी
दोगुने से दोगुना, चक्रवृद्धि है खुद में कमाल!
कागज़ का पतला पन्ना भी अगर दो फोल्ड का दो फोल्ड करते रहा जाए तो 42 बार ऐसा करने पर वह परत-दर-परत इतना मोटा हो जाएगा कि धरती से चांद तक से भी ऊपर चला जाएगा। जी हां, यह गणना आप खुद करके देख सकते हैं। अमूमन कागज़ के पन्ने की मोटाई 0.1 मिमी होती है। एक्सेल शीट पर 0.1*2^42 का हिसाब निकालें तो परिणाम आता है 4,39,804.65 किलोमीटर, जबकि धरती से चांद की दूरी है 3,84,400औरऔर भी
मुद्रा भंडार विदेशी ऋण से 12.25% ही ज्यादा!
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका अगर टैपरिंग या बॉन्ड खरीदने की रफ्तार नवंबर महीने से धीमी करता है तो भारत पर क्या असर पड़ेगा। सीधी-सी बात है कि विदेशी निवेशक हमारे बॉन्ड और शेयर बाज़ार से निकलने लगेंगे। इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार कम होगा। साथ ही जो डॉलर अभी 75 रुपए का मिल रहा है, वह हो सकता है कि 78 रुपए का मिलने लगे। इससे हमें विदेशी ऋणों की अदायगी पर ज्यादाऔरऔर भी







