सरकार लोगों की कमाई में ‘कट’ लेने का कोई भी मौका नहीं चूकना चाहती। उसने इस बार के बजट में किसी को टैक्स की कोई राहत नहीं दी। न तो इनकम टैक्स की दरों या स्लैब में कोई तब्दीली की गई, न ही शेयर बाज़ार के सौदों पर लगनेवाला सिक्यूरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) हटाने की कोई बात हुई, जबकि इसे कैपिटल गेन्स टैक्स बचाने की हिकमत को खत्म करने के लिए लाया गया था और शॉर्ट-टर्म कैपिटलऔरऔर भी

कोरोना के ओमिक्रॉन वैरिएंट की चिंता, उससे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़नेवाले असर का आकलन आर्थिक समीक्षा में किया गया है। उसमें औद्योगिक से लेकर मैन्यूफैक्चरिंग व कृषि क्षेत्र तक की स्थिति और चुनौतियों पर नज़र डाली गई है। लेकिन असली मसला है कि आज वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अपने चौथे बजट में अर्थव्यवस्था की दुर्दशा को किस हद तक स्वीकार करती हैं और उसे बेहतर बनाने के लिए क्या राह निकालती हैं। कई सवाल हैं किऔरऔर भी

आज से देश की अर्थव्यवस्था की दशा-दिशा तय करने में सबसे अहम संसद के बजट सत्र का आगाज़ हो रहा है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद संसद के संयुक्त सत्र में सरकार की उपलब्धियों और नीतियां का ब्यौरा पेश करेंगे। आज ही सरकार 2021-22 की आर्थिक समीक्षा पेश करेगी। बजट सत्र का पहला भाग 11 फरवरी तक चलेगा। उसके बाद एक महीने का अवकाश। सत्र का दूसरा भाग 14 मार्च से शुरू होकर 8 अप्रैल तक चलेगा। निश्चय हीऔरऔर भी

जैसे ‘हीरा सदा के लिए’ होता है, उसी तरह इन्फोसिस, रिलायंस इंडस्ट्रीज़, एचडीएफसी, टाटा एलेक्सी, लार्सन एंड टुब्रो, आईटीसी, हिंदुस्तान यूनिलीवर, डॉ. रेड्डीज़ लैबोरेटरीज़, मारुति सुज़ुकी और क्रिसिल जैसी कंपनियां हमेशा के लिए होती हैं। लेकिन शेयर बाज़ार में ऐसी कंपनियों की संख्या 40-50 से ज्यादा नहीं होतीं। बाकी हज़ारों कंपनियों से भरपूर मुनाफा कमाकर निकल ही लेना चाहिए। दिक्कत यह है कि बराबर बढ़ते भावों वाली कंपनियों के शेयर हम बेचकर निकल नहीं पाते क्योंकि हमेशाऔरऔर भी