बाज़ार गिर रहा है। गिरता ही जा रहा है। कहा जा सकता कि या तो यह करेक्शन है या तेज़ी के दौर का अंत और मंदी की शुरुआत। अगर करेक्शन है तो फिलहाल समझदारी इसी में है कि बाज़ार का तमाशा दूर खड़े रहकर बाहर से देखा जाए। नहीं तो अगर रिस्क लेने की भरपूर क्षमता हो, तरीका पता हो तो बाज़ार को शॉर्ट किया जाए, डेरिवेटिव सेगमेंट में शॉर्ट सेलिंग की जाए। हम सभी इंसान हैंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार अभी जिस तरह थोड़ा-थोड़ा गिर रहा है, उसे करेक्शन कहते हैं। 24 फरवरी को यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद छह ट्रेडिंग सत्रों में निफ्टी-50 सूचकांक 4.79% गिर चुका है। हो सकता है कि अगले कुछ हफ्तों में 10-12% गिर जाए। करेक्शन के ऐसे दौर में निवेशक घबरा जाते हैं। वे अपनी सारी योजना छोड़ मैदान से भागने लगते हैं। कुछ बाज़ार की सवारी करने का दम भरते हैं और उससे आगे निकलने कीऔरऔर भी

अनिश्चितता में फंसा शेयर बाज़ार गिर रहा होता है तब तलहटी और उभार की भविष्यवाणी करना बड़ा आसान लगता है। लेकिन इतने सारे अनजान कारक सक्रिय होते हैं कि कोई भविष्यवाणी काम नहीं करती। ऐसे में सतर्क रहते हुए सक्रियता घटाने के विकल्प पर गौर करना चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि बाज़ार में हमेशा ऐसे ट्रेडर मिल जाते हैं जो अनिश्चितता की थाह लेने और उससे पार पाने में कहीं ज्यादा सुलझे होते हैं। बाज़ार मेंऔरऔर भी

जीवन के तमाम क्षेत्र हैं जहां जमकर मेहनत करो तो अच्छे नतीजे मिलते हैं। पढ़ाई से लेकर खेल तक में कठिन-कठोर प्रयास व अभ्यास से ज्यादा सफलता मिलती है। लेकिन शेयर बाज़ार के निवेश व ट्रेडिंग में अक्सर ऐसा नहीं होता। वहां तो अनिश्चितता की भंवर में ज्यादा हाथ-पैर मारने पर आप डूब सकते हैं। फिर भी कुछ बावले होते हैं जो मानते हैं कि वे बाज़ार या स्टॉक्स की तहलटी पकड़ने में माहिर है और वहांऔरऔर भी

आगे क्या होगा, कोई पक्के तौर पर नहीं जानता। शेयर बाज़ार यह सच बार-बार, हर बार साबित करता रहता है। सौ सालों की सबसे भयंकर महामारी साल 2020 से 2021 तक दुनिया को जकड़े रहे। लेकिन इस दौरान शेयर बाज़ार 50% से ज्यादा बढ़ गए। हमारे यहां तो निफ्टी मार्च 2020 में 7600 तक गिरने के बाद अक्टूबर 2021 में 18500 तक चला गया। जिस आपदा ने अर्थव्यवस्था को चूर-चूर कर दिया, उस दौरान निफ्टी-50 सूचकांक 143.42%औरऔर भी