शेयर बाज़ार में हम-आप जैसे लोगों के लिए लम्बे समय का निवेश एक तरह की ट्रेडिंग है क्योंकि आप वॉरेन बफेट या राकेश झुनझुनवाला की तरह किसी कंपनी का मालिकाना लेने या उसके प्रबंधन में शामिल तो नहीं हो जा रहे। निवेश कुछ साल के बाद बेचेंगे नहीं तो फायदा कैसे होगा! इसलिए लम्बा निवेश भी ट्रेडिंग है। दूसरी तरफ ट्रेडिंग भी छोटे समय का निवेश है। इंट्रा-डे ट्रेडिंग एक दिन के लिए, स्विंग व मोमेंटम ट्रेडिंगऔरऔर भी

कुछ लोग शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग से इसलिए घबराते हैं कि इससे होनेवाली आय को बिजनेस आय माना जाएगा और उन्हें ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा। वे यह नहीं समझते कि वे अपनी जेब से नहीं, बल्कि अपनी कमाई पर टैक्स दे रहे हैं। कमाया तभी तो उसका एक हिस्सा टैक्स के रूप में चुकाया। नहीं कमाते तो कहां से टैक्स देते! कहने का सार यह है कि पहले कमाने की सोचें। टैक्स देने के भय से कमानेऔरऔर भी

डिमांड ज़ोन के आसपास खरीदो और सप्लाई ज़ोन की रेंज में पहुंचते ही बेचकर मुनाफा कमा लो। खरीदने और बेचने का दरमियानी फासला कुछ दिन से लेकर एकाध महीने से ज्यादा का भी हो सकता है। लेकिन किसी भी हालत में ट्रेडिंग या कहें तो अल्पकालिक निवेश की अवधि 90 दिन या तीन महीने से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। नहीं तो आप फंस जाओगे तो कई सालों में बहुत हुआ तो अपनी बचत को मुद्रास्फीति के असरऔरऔर भी

भारत जैसी संभावनाओं से भरी उभरती अर्थव्यवस्था में सम्पूर्ण शेयर बाज़ार या व्यावहारिक रूप से कहें तो निफ्टी-50 या सेंसेक्स-30 जैसे सूचकांकों के ईटीएफ में निवेश करना सदा के लिए होना चाहिए। ऐसा निवेश पांच, दस या बीस साल बाद तभी बेचकर मुनाफा निकालना चाहिए, जब खास ज़रूरत पड़ जाए। इनके बाहर कुछ ही कंपनियां होती हैं जिनमें निवेश सदा के लिए होता है। बाकी तमाम कंपनियों में किया निवेश ऐसा होता है कि लक्ष्य पूरा करतेऔरऔर भी