हर ट्रेडर की चाहत व कोशिश यही रहती है कि उसका हर दिन मुनाफे का रहे। लेकिन हकीकत में ऐसा कहां हो पाता है! हमारे तमाम प्रयासों के बावजूद बहुत-बहुत से कारक हमारे सोचे व चाहे लक्ष्य को पूरा नहीं होने देते। हम इन कारकों को तो नहीं बदल सकते। लेकिन खुद को बदल या पीछे ज़रूर खींच सकते हैं। जिस दिन आपका मूड खराब हो, घर में या बाहर किसी से झगड़ा किया हो, मन बहुतऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में स्टॉप-लॉस लगता ही लगता है। इससे कोई नहीं बच सकता। अनुभवी ट्रेडर इसकी पूरी तस्दीक करेंगे। किसी दिन व हफ्ते में ज्यादा नुकसान होता है तो किसी दिन व हफ्ते में कम। अनुभवी व कुशल ट्रेडर की हरचंद कोशिश होती है इस घाटे को कम से कम करना। इसके लिए वह ऐसा सिस्टम बनाता है जो उसके टेम्परामेंट से मेल खाता है। ध्यान रखें कि आप जितना सहज होकर ट्रेड करेंगे, कामयाबीऔरऔर भी

क्या शेयर बाज़ार को मात दी जा सकती है? इस सवाल का जवाब हां और ना दोनों है। हम यकीनन ट्रेडिंग में बाज़ार को मात नहीं दे सकते क्योंकि उसमें एक की हार ही दूसरे की जीत होती है। ज़ीरोसम गेम, एक का नुकसान, दूसरे का फायदा। लेकिन लम्बे समय के निवेश में, जहां समय बड़ा कारक बन जाता है, जहां वर्तमान के गर्भ से भविष्य का जन्म होता है, वहां सूझबूझ से बाजार को मात दीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में सफलता के लिए दो चीजें बहुत ज़रूरी हैं। एक, घाटा कम से कम हो और दो, हम घाटे के सदमे से जल्दी से जल्दी बाहर निकल आएं। घाटा कम से कम रखने का एक तरीका यह है कि नए ट्रेडरों को स्टॉप-लॉस 2% से ज्यादा नहीं रखना चाहिए। मान लें कि कोई ट्रेडर महीने में दस में से चार सौदों में जीते और छह में हारे। चार में कम से कम 4-4%औरऔर भी

शेयर बाजार के ट्रेडरों की कामयाबी दर क्या है, यह उन्हें तो गिनना ही चाहिए, हमारी पूंजी बाजार नियामक सेबी को भी इसका हिसाब-किताब रखना चाहिए। तभी हम पतंगों की तरह इंट्रा-डे की तरफ उमड़े लाखों व्यक्तिगत ट्रेडरों को सही व व्यावहारिक वित्तीय शिक्षा दे सकते हैं। यूरोप में तो बाकायदा नियम है। इसके तहत सभी ऑनलाइन ब्रोकरों को घोषित करना पड़ता है कि उनके क्लाएंट या ग्राहकों की कामयाबी दर कितनी रही है? आप जानकर चौंकऔरऔर भी