रुपया अर्थव्यवस्था नहीं, टिका डॉलर पर
देश की मुद्रा की विनिमय दर और उसकी अर्थव्यवस्था में क्या सम्बन्ध है? कोई भी सीधा रिश्ता नहीं। दशकों पहले पीपीपी (परचेज़िंग पावर पैरिटी) का पैमाना चलता था। तब मुद्रा का बाहरी मूल्य उसके आंतरिक मूल्य से तय होता था। अलग-अलग मुद्राओं से संबंधित देश के भीतर चल रही मुद्रास्फीति के अंतर से उसकी मुद्रा की विनियम दर तय होती थी। तब देश के निर्यात व आयात का अंतर या चालू खाता खास मायने रखता था। लेकिनऔरऔर भी
रिश्ते मुद्रा, अर्थव्यवस्था, शेयर बाज़ार के
बड़ी सीधी साफ-सी बात है कि किसी देश की अर्थव्यवस्था हमेशा उसकी अपनी मुद्रा में चलती है। अमेरिका की डॉलर में, ब्रिटेन की पौंड में, यूरोप की यूरो में तो भारत की रुपए में। लेकिन टेढ़ी-सी बात यह है कि क्या आज की ग्लोबल दुनिया में देश की अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित शक्ति और उसकी मुद्रा की विनिमय दर में कोई सीधा रिश्ता है? फिर सवाल यह भी उठता है कि क्या आज के माहौल में शेयर बाज़ारऔरऔर भी
न उन्माद में उड़ना, न हताशा न धंसना
ज्यों-ज्यों निफ्टी 20,000 अंक के करीब पहुंचता जा रहा है, बाज़ार में उन्माद बढ़ता जा रहा है। लेकिन किसी भी किस्म का उन्माद समझदारी को धुंधला कर देता है और हम बहक कर गलत फैसले ले सकते हैं। इसलिए उन्माद में भी हमें संतुलित रहना चाहिए। वहीं, अगर मान लीजिए कि निफ्टी 20,000 का स्तर छूने से पहले ही फिसलकर गिर गया या लम्बे तक सीमित रेंज में भटकता रहे, तब भी हमें न तो हताश होनाऔरऔर भी
आलम तेज़ी का, गिरने की गुंजाइश खत्म
निफ्टी के गिरने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। वो तो हर दिन नए से नया शिखर बनाता जा रहा है। 20,000 अंक से महज 6% दूर रह गया है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की खरीद जारी रही तो यह मंज़िल हफ्ते-दस दिन में ही हासिल हो सकती है। इसलिए हाल-फिलहाल ऐतिहासिक शिखर से 20% गिरने की आशंका खत्म हो चुकी है। दूसरे शब्दों में बाज़ार में मंदड़ियों का शिकंजा कसने के आसार नहीं दिख रहे। इसलिए ज्यादाऔरऔर भी









