बैंक चमके, कब चमकेगी मैन्यूफैक्चरिंग!
शेयर बाजार के बढ़ने का देश में गरीबी या बेरोज़गारी से कोई ताल्लुक नहीं है। उसका खास रिश्ता देश के जीडीपी और उसमें भी मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र के विकास से होता है। बैंकों की बैलेंस शीट पुराने ऋणों को राइट-ऑफ और एनपीए को एनकेन प्रकारेण घटाकर चमका दी गई है। यह भी सच है कि इधर कई सालों से सरकार का ज़ोर इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण, रेलवे और डिफेंस क्षेत्र को मजबूत करने पर है। इंजीनियरिंग व कंस्ट्रक्शन केऔरऔर भी
वो विकास जिसका आधार सच नहीं झूठ
भारत विपुल संभावनाओं से भरा देश है। आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर भी। हमने अभी तक जो हासिल किया है, वह हमारी अंतर्निहित सामर्थ्य से बहुत-बहुत कम है। लेकिन पूर्णता पाने के लिए सच को आधार बनाना और जिस झूठ ने हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक जीवन को दबोच रखा है, उसे जड़ से मिटा देना ज़रूरी है। असल में, कोई भी विकास सच को आधार बनाकर ही किया जाता है।औरऔर भी
धंधा कागज़ों में नहीं, असल में हो सही
माल उतना ही और वहीं व उसी को बेचो, जहां से पेमेंट जल्दी से जल्दी मिल जाए। पेमेंट में देरी हो गई तो धंधा चौपट हो सकता है। यह सब्जी व किराना स्टोर से लेकर छोटे व बड़े बिजनेस तक का मंत्र है। हम अक्सर कंपनी की लाभप्रदता परखने के लिए इतना भर देखते हैं कि कहीं वह कर्ज के बोझ तले दबी तो नहीं और उसका ऋण-इक्विटी अनुपात हर हाल में एक से कम हो। लेकिनऔरऔर भी
अर्थव्यवस्था लस्त, फिर भी बाज़ार मस्त!
मानते हैं कि अर्थव्यवस्था या जीडीपी के बढ़ने और शेयर बाज़ार के चढ़ने में सीधा रिश्ता है। लेकिन हकीकत ऐसी नहीं दिखती। चीन का जीडीपी जब जमकर बढ़ रहा था, तब वहां का शेयर बाज़ार धीमी गति से चल रहा था। भारत के जीडीपी के विकास दर जब ज्यादा चल रही थी, तब सुस्त गति से बढ़ते अमेरिका के शेयर बाज़ार ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भारत से कहीं ज्यादा रिटर्न दिया था। इस समय भी जब हमाराऔरऔर भी






