दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका से उत्साहित करनेवाली आर्थिक खबरें आ रही हैं। फिर भी माहौल में अजब किस्म की पस्ती है। भारत के साथ इसका उल्टा है। यहां आर्थिक खबरों में कोई खास उत्साह नहीं। मोदी सरकार के दस साल में जीडीपी 5.9% सालाना की दर से बढ़ा है, जबकि मनमोहन सिंह के दस साल में जीडीपी इससे ज्यादा 6.8% सालाना की दर से बढ़ा था। मगर माहौल ऐसा बना दिया गया है कि जैसेऔरऔर भी

यह कैसी विडम्बना है कि शेयर बाज़ार हमारा, लेकिन कमाकर ले जा रहे हैं विदेशी। यकीनन, बाज़ार में तेज़ी की एक खास वजह है कि देश में आ रहा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई)। लेकिन उनका लगाया धन बढ़ रहा है आम भारतीय निवेशकों के धन से, जो सीधे-सीधे रिटेल निवेश व ट्रेडिंग के साथ ही परोक्ष रूप से बाज़ार में म्यूचुअल फडों व बीमा कंपनियों के ज़रिए आ रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में रिसर्च फर्मऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूर की कौड़ी फेंकने में उस्ताद हैं। उनकी यह प्रतिभा चुनावों के मौजूदा मौसम में कुछ ज्यादा ही सिर चढ़कर बोल रही है। 23 बाद 2047 में भारत को विकसित देश बनाने की कौड़ी क्या कम थी जो राजस्थान के चुरु और उत्तर प्रदेश के सहारनरपुर जैसी छोटी जगहों की चुनावी रैलियों में जनता को हांक रहे हैं कि वे भारत की अर्थव्यवस्था को दस साल में जिस ऊंचाई पर ले गए हैं, उसकीऔरऔर भी

रिजर्व बैंक ने नए वित्त वर्ष की पहली मौद्रिक नीति में रेपो दर को 6.5% पर जस का तस रखा है। इस दर पर रिजर्व बैंक बैंकों को एकाध दिन के लिए उधार देता है। यह पूरे सिस्टम में ब्याज दर की मानक है। इससे पहले कोविड महामारी के दौरान मई 2020 में उसने रेपो दर घटाकर 4% की थी। फिर इसे धीरे-धीरे बढ़ाकर फरवरी 2023 में 6.5% किया और तब से बदला नहीं है। रिजर्व बैंकऔरऔर भी

पढ़-लिखकर काम-धंधा पाने की हमारे नौजवानों की सहज व वाजिब ख्वाहिश मिट्टी में मिलती जा रही है। सबसे ज्यादा बेरोज़ागर वे युवा हैं जो ग्रेजुएट है। इसमें भी लड़कियों का हिस्सा लड़कों से लगभग पांच गुना है। यह स्थिति तब है, जब हमारी श्रमशक्ति का करीब 90% हिस्सा आज भी असंगठित क्षेत्र में है या स्वरोजगार में लगा है जहां किसी तरह की कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं। दिक्कत यह है कि सरकार इसका कोई ठोस उपा करनेऔरऔर भी