रोज़गार के नाम पर ‘मुद्रा’ की हवाबाज़ी

पढ़-लिखकर काम-धंधा पाने की हमारे नौजवानों की सहज व वाजिब ख्वाहिश मिट्टी में मिलती जा रही है। सबसे ज्यादा बेरोज़ागर वे युवा हैं जो ग्रेजुएट है। इसमें भी लड़कियों का हिस्सा लड़कों से लगभग पांच गुना है। यह स्थिति तब है, जब हमारी श्रमशक्ति का करीब 90% हिस्सा आज भी असंगठित क्षेत्र में है या स्वरोजगार में लगा है जहां किसी तरह की कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं। दिक्कत यह है कि सरकार इसका कोई ठोस उपा करने के बजाय जुबानी गुलछर्रे उड़ा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तभी से जो खुद हो रहा है, उसका श्रेय लूटने की कला में सिद्धहस्त हैं। इन्हें पता चला कि अपने यहां स्वरोज़गार का ही दबदबा है तो इन्होंने इसका श्रेय लेने के लिए अप्रैल 2015 में मुद्रा योजना चला दी और कहां कि हमें रोजगार पाने नहीं, रोजगार देनेवाले लोग तैयार करने हैं। सरकार का दावा है कि अब तक इस योजना के तहत 47 करोड़ से ज्यादा लोगों को ₹27.75 लाख करोड़ के ऋण बांटे गए हैं। दिक्कत यह है कि इन ऋणों में से तीन-चौथाई से ज्यादा शिशु ऋण यानी ₹50,000 तक के ऋण हैं और इनकी औसत रकम मात्र ₹29,000 है। इतनी रकम में कोई खुद कितना कमाएगा और कितनों को रोजगार देगा? लेकिन सरकारी मंत्रियों का कहना है कि मुद्रा योजना से 15-20 करोड़ लोगों को रोज़गार मिला है। अब शुक्रवार का अभ्यास…

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