बाज़ार से ₹16-17 लाख करोड़ का उधार लेना कोई मामूली बात नहीं। सरकार मार्च 2027 तक बाज़ार से इसमें से ₹7.86 लाख करोड़ जुटाएगी। पहले सरकार ने कब बाज़ार से लोन उठाया, पता ही नहीं चलता था। वित्त वर्ष 2011-12 तक बैंक सरकारी ऋणों का 44.2% हिस्सा सोख लेते थे जो जीडीपी का 25.1% था। तब रिजर्व बैंक ने सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) 40% बना रखा था। इसके चलते बैंकों को अपनी कुल जमा का कम से कम 40% सरकारी बॉन्डों में लगाना पड़ता था। रिजर्व बैंक ने इसे धीरे-धीरे घटाकर अप्रैल 2020 से 18% कर दिया है। इसके बाद स्थिति यह है कि वित्त वर्ष 2023-24 तक सरकारी बॉन्डों में बैंकों का निवेश घटकर 37.1% और जीडीपी का 23.8% रह गया। सरकारी बॉन्डों में म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियों, पेंशन फंड व गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों वगैरह का निवेश इसी दौरान 23.6% और जीडीपी के 13.5% से बढ़कर बैंकों से ज्यादा क्रमशः 40.6% और 26.1% हो गया। वैसे तो बैंक भी जमाकर्ताओं का ही धन सरकारी बॉन्डों में लगाते थे। लेकिन उन्हें तुरत-फुरत इन्हें भुनाना नहीं होता था। अब म्यूचुअल फंड जैसी अन्य वित्तीय संस्थाओं को निवेशकों की मांग पर कभी भी बॉन्ड बेचकर निकलना पड़ता है। महंगाई बढ़ी, ब्याज बढ़ी, यील्ड बढ़ी तो बॉन्डों के दाम घटे, दबाव बढ़ा। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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