इस समय देश की आर्थिक स्थिति बड़ी विचित्र है। अंदर-अंदर मूल अर्थव्यवस्था ठंडी पड़ी है। औद्योगिक निवेश अटका है तो वास्तविक वेतन/मजदूरी भी। असली कमाई नहीं बढ़ रही तो लोगबाग कमाने के लिए म्यूचुअल फंड में एसआईपी कर रहे हैं। जमकर परसनल लोन भी ले रहे हैं। यहां तक कि गाढ़े वक्त के लिए रखा गया सोना तक गिरवी रखकर लोन ले रहे हैं। ठहरी औद्योगिक मांग और बढ़ते कर्ज पर टिकी खपत ने गजब का असंतुलन पैदा कर रखा है। यह कैसी विसंगति है कि एक तरफ भारत प्रति व्यक्ति जीडीपी में दुनिया में 146वें स्थान पर है, दूसरी तरफ हमारे शेयर बाज़ार का पूंजीकरण दुनिया में बढ़कर पांचवें स्थान पर पहुंच गया है। ठीक अमेरिका, चीन, जापान व ताईवान के नीचे। एनएसई का बाज़ार पूंजीकरण अभी 5.14 ट्रिलियन डॉलर है जो आईएमएफ द्वारा घोषित 2025-26 के जीडीपी 3.92 ट्रिलियन डॉलर का 1.31 गुना है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ इंडियन इकॉनमी ने देश के बढ़ते वित्तीयकरण पर एक गहन शोध रिपोर्ट जारी है। ऊपर-ऊपर सब चंगा दिखता है। वास्तविक जीडीपी की विकास दर 7-8% चल रही है। रिटेल मुद्रास्फीति बढ़ने के बावजूद अब भी 6% से नीचे है। कॉरपोरेट क्षेत्र की बैलेंस शीट एक दशक की सबसे साफ-सुथरी स्थिति में हैं। बैंकों के पास इफरात पूंजी है। फिर आखिर समस्या कहां है? अब मंगलवार की दृष्टि…
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