देश का नॉमिनल जीडीपी बीते वित्त वर्ष 2025-26 में अनंतिम अनुमान के मुताबिक ₹346.36 लाख करोड़ रहा है। इस बार के बजट में 2026-27 में इसके ₹393.01 लाख करोड हो जाने का अनुमान है। भारत पर चढ़ा देशी-विदेशी कुल ऋण मार्च 2026 तक ₹197.18 लाख करोड़ है और मार्च 2027 तक इसके बढ़कर ₹214.82 लाख करोड़ हो जाने का बजट अनुमान है। इस तरह गणना करें तो 2025-26 में भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात 56.9% है जो 2026-27 में घटकर 54.7% हो सकता है। अपने आप में देश पर चढ़े ऋण की मात्रा और जीडीपी के साथ उसके अनुपात का भी कोई खास मतलब नहीं। जापान दुनिया का सबसे कर्जदार देश है। लेकिन उसका सारा ऋण घरेलू मुद्रा येन और जापानी संस्थाओं द्वारा दिया गया है तो किसी को कोई चिंता नहीं। यह तथ्य भी जान लें है कि भारत से बड़ी पांचों अर्थव्यवस्थाओं का ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे कहीं ज्यादा है। अमेरिका का 125%, चीन का 85%, जापान का 235%, जर्मनी का 64% और ब्रिटेन का 95% है। आप कहेंगे कि तब तो भारत की बहुत अच्छी स्थिति है। लेकिन अर्थशास्त्री कहते हैं कि देश पर चढ़ा ऋण तो स्टॉक है, जबकि जीडीपी फ्लो है। एक ठोस बंधा हुआ, दूसरा बहता प्रवाह। ऐसे में स्टॉक और फ्लो के अनुपात से हम किसी सार्थक निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते। तो करें क्या? अब बुधवार की बुद्धि…
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