ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एकदम बौडम और महामूर्ख हैं। ऐसा भी नहीं कि देश-विदेश में विशेषज्ञों की कोई कमी है। लेकिन असली समस्या यह है कि सरकार की नीयत में भयंकर खोट है। बजट में कहा गया है कि किसानों की आमदनी बढ़ाने का लक्ष्य उत्पादकता और उद्यमशीलता बढ़ाकर हासिल किया जाएगा। लघु व सीमांत (2.5 एकड़ से पांच एकड़ जोत वाले) किसानों पर खास ध्यान दिया जाएगा। सरकार ने इसके लिए भारत-विस्तार का नया जुमला उछाल दिया है। विस्तार यानी, वर्चुअली इंटीग्रेटेड सिस्टम टू एक्सेस एग्रीकल्चरल रिसोर्सेज़। यह ऐसा बहुभाषी एआई टूल है जो एग्रीस्टैक पोर्टल्स को कृषि व्यवहार पर आईसीएआर के पैकेज़ को एआई सिस्टम के साथ एकीकृत कर देगा। सरकार का कहना है कि इससे खेती में उत्पादकता बढेगी और किसान बेहतर फैसले ले पाएंगे। मगर, सरकार की कथनी और करनी का अंतर उसकी नीयत में खोट को साफ कर देता है। कृषि उत्पादकता बढ़ानी थी तो कृषि रिसर्च पर खर्च बढ़ा देते। लेकिन बजट में कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय का आवंटन 2026-27 में 2025-26 के ₹1.33 लाख करोड़ के संशोधित अनुमान से 5.4% बढ़ाकर ₹1.41 लाख करोड़ कर दिया गया है। मगर कृषि रिसर्च व शिक्षा पर खर्च ₹10,281 करोड़ से 3.05% घटाकर ₹9967 करोड़ कर दिया गया है। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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