मौद्रिक नीति में रिजर्व बैंक बढ़ा सकता है ब्याज दरें: वित्त सेवा सचिव

ठीक एक हफ्ते बाद आज ही के दिन भारतीय रिजर्व बैंक नए वित्त वर्ष 2010-11 की सालाना मौद्रिक नीति घोषित करेगा। इसलिए वह क्या करेगा क्या नहीं, इसको लेकर कयासों का दौर तेज होने लगा है। आज वित्त मंत्रालय में वित्तीय सेवाओं के सचिव आर गोपालन ने कहा कि रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति थोड़ा और कठोर बना सकता है। वे राजधानी दिल्ली में संवाददाताओं से बात कर रहे थे। बता दें कि रिजर्व बैंक स्वायत्त नियामक संस्था है और जरूरी नहीं है कि वह वित्त मंत्रालय की हां में हां मिलाए।

रिजर्व बैंक इससे पहले 29 जनवरी 2010 को नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) को 5 फीसदी से बढ़ाकर 5.75 फीसदी कर चुका है। सीआरआर बैंकों की कुल जमा का वह हिस्सा होता है जिसे उन्हें रिजर्व बैंक के पास नकद रखना होता है। इस पर उन्हें कोई ब्याज भी नहीं मिलता। इसके बाद रिजर्व बैंक ने 19 मार्च को रेपो दर को 4.75 फीसदी से बढ़ाकर 5 फीसदी और रिवर्स रेपो दर को 3.25 फीसदी से बढ़ाकर 3.50 फीसदी कर दिया था। रेपो वह सालाना ब्याज दर होती है जिस पर बैंक रिजर्व बैंक के पास सरकारी प्रतिभूतियां रखकर एक-दो दिन के लिए नकदी उधार लेते हैं और रिवर्स रेपो दर पर बैंक रिजर्व बैंक के पास अपनी अतिरिक्त नकदी रखकर ब्याज कमाते हैं।

मौद्रिक नीति को कठोर करने का मतलब इन्हीं उपायों से होता है। वित्तीय सेवा सचिव आर गोपालन ने संवाददाताओं से कहा कि वे उन विशेषज्ञों से इत्तेफाक रखते हैं जिनकी राय में मौद्रिक नीति को थोड़ा कड़ा करने की जरूरत है। वैसे, शेयर व बांड बाजार के निवेशक मानकर चल रहे हैं कि रिजर्व बैंक रेपो और रिवर्स रेपो को चौथाई फीसदी बढ़ाकर ब्याज दरों को बढ़ाने का संकेत देगा।

बढ़ती मुद्रास्फीति के आंकड़ों ने भी ब्याज दरों को बढ़ाने का माहौल बना दिया है। फरवरी में औद्योगिक उत्पादन में 15 फीसदी बढ़त ने भी दिखा दिया है कि लोगों को धन अभी सस्ता पड़ रहा है। इसका सबूत कार, मोटरसाइकिल और टेलिविजन सेट की रिकॉर्ड बिक्री में देखा जा सकता है। वैसे भी गुरुवार को यानी परसों थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति के मार्च महीने के आंकड़े आनेवाले हैं जिसके 10 फीसदी से ऊपर जाने की उम्मीद है। इसलिए रिजर्व बैंक मांग को ठंडा करने के लिए धन को महंगा करेगा। मांग घटेगी तो मुद्रास्फीति घट सकती है।

वैसे, आर गोपालन ने कहा कि रिजर्व बैंक को मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास को गति देने के बीच संतुलन कायम रखना होगा। उन्होंने कहा कि विकास भी एक मसला है और मुद्रास्फीति भी। इनके बीच संतुलन बैठाना जरूरी है।

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