धूमिल की मशहूर पंक्ति है कि लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो, उस घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है। इसी तरह 12 साल के मोदीराज में भारत की विकासगाथा कहां तक पहुंची है, इसका जवाब सरकार के बड़े-बड़े विज्ञापनों और जीपीपी के डेटा, भुगतान संतुलन की स्थिति या शेयर बाज़ार की उठापटक में नहीं, बल्कि करोड़ों छात्र-छात्राओं और युवक-युवतियों की घुटन व कुंठा में ढूंढा जाना चाहिए। कभी पेपरलीक तो कभी परीक्षा रद्द। कोई मीडिया नहीं, बल्कि 18 साल के छात्र परीक्षा पद्धति की धांधली को एक्सपोज करने के लिए आगे आने लगे हैं। केंद्र से लेकर राज्यों के तमाम विभागों में लाखों रिक्तियां हैं, लेकिन वे भरी नहीं जा रहीं। देश की युवा आबादी अंदर ही अंदर सुलग रही है। यह कोई छोटी-मोटी नहीं, देश की आबादी का 65% हिस्सा है जिसकी उम्र 35 साल से कम है। सारी दुनिया ने इसे भारत की आस्ति माना था। देश का डेमोग्राफिक डिविडेंड बताया गया। लेकिन सरकार जिस तरह किसानों की आत्महत्या का पुराना और आधा-अधूरा डेटा दे रही है, उसी तरह उसने बेरोज़गारी के डेटा को ऐसा उलझा दिया है कि कोई साफ तस्वीर नहीं बनती। साफ तस्वीर बन जाए तो विकसित देशों की तरह हर बेरोजगार उसकी देनदारी बन जाएगा। तब उसे टैक्स से मिला जनधन देश की आस्ति, युवा आबादी के नियोजन पर खर्च करना होगा। अब सोमवार का व्योम…
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