विश्व अर्थव्यवस्था खतरनाक दौर में, यूरोप में मंदी तो भारत पड़ा सुस्त

विश्व अर्थव्यवस्था इस समय ‘खतरनाक दौर’ में जा पहुंची है। यूरोप मंदी की चपेट में आ चुका है। यह किसी ऐरे-गैरे का नहीं, बल्कि विश्व बैंक का कहना है। साथ ही उसका यह भी कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर चालू वित्त वर्ष 2011-12 में 6.8 फीसदी रहेगी, जबकि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का नया अनुमान 7 से 7.5 फीसदी का है। पिछले वित्त वर्ष 2010-11 में भारत का जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 8.5 फीसदी बढ़ा था, जबकि चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में इसकी विकास दर 7.3 फीसदी रही है।

विश्व बैंक ने साल में दो बार पेश की जानेवाली अपनी ताजा रिपोर्ट – ग्लोबल इकनॉमिक प्रॉस्पेक्ट्स में कहा है कि अब विश्व अर्थव्यवस्था के साल 2012 और 2013 में क्रमशः 2.5 फीसदी और 3.1 फीसदी बढ़ने की उम्मीद है, जबकि जून 2011 में इन दोनों सालों के दौरान 3.6 फीसदी विकास दर का अनुमान लगाया गया था। उसका कहना है कि विश्व अर्थव्यवस्था खतरनाक दौर में पहुंच गई है और यूरोप की वित्तीय उथलपुथल अभी तक अप्रभावित रहे विकासशील देशों तक फैल गई है।

रिपोर्ट कहती है, “यूरोप, लगता है, मंदी की हालत में पहुंच गया है। साथ ही, कई प्रमुख विकासशील देशों (ब्राज़ील, भारत, रूस, दक्षिण अफ्रीका व तुर्की) में विकास की दर काफी धीमी पड़ चुकी है। यह मुख्य रूप से 2010 के आखिरी व 2011 के शुरुआती महीनों में मुद्रास्फीति के दबावों से लड़ने के लिए कड़ी की गई मौद्रिक नीति के असर को दिखाता है।” परिणामस्वरूप, अमेरिका व जापान में आर्थिक सक्रियता बढ़ने के बावजूद वैश्विक विकास और विश्व व्यापार में तीखी गिरावट आई है।

भारत के बारे में विश्व बैंक का कहना है कि अगले वित्त वर्ष 2012-13 में भी इसकी आर्थिक विकास दर 6.8 फीसदी पर टिकी रहेगी। हां, इसके बाद 2013-14 में यह वापस 8 फीसदी पर आ सकती है। विश्व बैंक ने विकासशील देशों की सालाना विकास दर का अनुमान 6.5 फीसदी से घटा कर 5.4 फीसदी कर दिया है। विकसित देशों की विकास दर 2.7 फीसदी से घटकर 1.4 फीसदी पर आने का अनुमान है। यूरो ज़ोन के 17 देशों के लिए तो बढ़ने के बजाए घटने के आसार जताए गए हैं। 1.8 फीसदी विकास दर के पिछले अनुमान को अब ऋणात्मक में 0.3 फीसदी कर दिया गया है।

विश्व बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री जस्टिन यिफु लिन ने बीजिंग में कहा है, “विश्व अर्थव्यवस्था एक ऐसे दौर में पहुंच रही है जहां अनिश्चितता और खतरा है। पूंजी बाजार के ठप पड़ने और दुनिया भर में मंदी का खतरा बिल्कुल वैसा ही है जैसा 2008 में हुआ था।” लिन ने कहा कि कई देश तो 2008 की मंदी के मुकाबले काफी बुरी हालत में हैं क्योंकि इन देशों का कर्ज और बजट घाटा पहले से बढ़ गया है। लिन ने कहा, “मंदी की हालत में कोई देश अछूता नहीं रहेगा। आशंका है कि गिरावट पिछली बार से ज्यादा और लंबे समय तक रहेगी।”

विश्व बैंक की रिपोर्ट में यूरोप के कर्ज संकट और अमेरिका में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या के गहराने का जिक्र है। अमेरिका के लिए विश्व बैंक ने 2012 में सालाना विकास दर 2.9 फीसदी से घटा कर 2.2 फीसदी कर दी है जबकि 2013 के लिए इसे 2.7 फीसदी से घटा कर 2.4 फीसदी किया गया है। इसके पीछे वैश्विक मंदी और अमेरिका के टैक्स और ज्यादा खर्च को कारण बताया गया है। चीन की विकास की दर 2012 की आखिरी तिमाही में ढाई सालों में सबसे कम 8.9 फीसदी रही है जबकि इससे पहली तिमाही में यह 9.1 फीसदी थी।

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