अजीब है! मंदड़िए बदलते हैं पाला

बाजार में ज्यादा गिरने की गुंजाइश अब बची नहीं है। लेकिन हमारा बाजार इतना खोखला है कि यहां डेरिवेटिव्स के जरिए कृत्रिम स्तर बना दिए जाते हैं। यूं तो इस हफ्ते निफ्टी 4742.80 से शुरू होकर आज 4866 पर बंद हुआ। लेकिन सारी अच्छी खबरों के बावजूद इसे गिराकर 4400 से 4000 तक पहुंचा दिया जाए तो मुझे कोई अचंभा नहीं होगा। असल में अपने यहां पिछले 12 महीनों में निचले स्तरों, निफ्टी के औसतन 5000 के स्तर पर इतनी शॉर्ट सेलिंग हुई है कि जब तक वह 4000 तक नहीं गिरता, तब शॉर्ट करनेवालों को कतई फायदा नहीं होगा।

यहां कुछ शातिर मंदड़ियों में एक अनोखी प्रवृति देखी गई है कि वे बाजार को पीटते तो रहते हैं। लेकिन लगातार तीन दिन तक वे खास स्तर को तोड़ने में नाकाम रहे तो वे पूरे ट्रेड की दिशा पलट देते हैं। शॉर्ट से लांग हो जाते हैं। शॉर्ट कवरिंग शुरू हो जाती है। यह खतरनाक खेल कुछ ही लोग कर सकते हैं। हम कभी भी बेहताशा बिक्री की सलाह नहीं देते क्योंकि बाजार जब यू-टर्न लेता है तो सारे साल की कमाई उड़ा ले जाता है। इसलिए हम केवल लांग के पक्ष में ट्रेड करने की सलाह देते हैं। यह रिटेल ट्रेडरों के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प है। जब आप मूलतः तेजी के बाजार में हों और गहरे करेक्शन का सिलसिला चल रहा तो हर गिरावट पर खरीदने की रणनीति ही कारगर होती है।

हालांकि अभी जो माहौल बना है, उसमें तीसरी तिमाही के नतीजों का बहाना बनाकर मंदड़िए बाजार को तोड़ने की हरचंद कोशिश करेंगे। जैसा, कल इनफोसिस के नतीजों के आने के बाद हुआ। आज भी उसे उठाकर दबाने की कोशिश की गई। वे निवेशकों में जमे डर को और बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन हमारा मानना है और हम यह बात बार-बार कह रहे हैं कि अब सब दुरुस्त हो रहा है। हाथ से निकता राजकोषीय घाटा, औद्योगिक धीमापन, राजनीतिक अस्थायित्व, सुधारों की कमी और अंततः बेकाबू मुद्रास्फीति अब काबू में आ रही है। आईआईपी ने नवंबर में 5.9 फीसदी वृद्धि हासिल कर बड़े-बड़े विद्वानों को चौंका दिया है। अब सोमवार को मुद्रास्फीति 8 फीसदी या इससे नीचे जाकर माहौल को और खुशनुमा बना सकती है।

अभी के हालात 2008 के लेहमान संकट के दौर से बहुत भिन्न नहीं है। केवल अंतर इतना है कि उस बार सुधार तेजी से हुआ था, जबकि इस बार 15 महीने बीत चुके हैं। करेक्शन का दौर ऐतिहासिक रूप से अभी तक 15 महीनों से ज्यादा नहीं चला है। हालांकि यह और खिंचा तो 23 महीने तक जा सकता है जो मंदी के दौर में 20 साल में ही एक बार होता है।

हमारा मानना है कि दिसंबर में रिजर्व बैंक ब्याज दरों को बढ़ाने का क्रम रोक चुका है। बहुत जल्दी ही वह ब्याज दरों में कमी करेगा। हो सकता है कि 24 जनवरी को कर दे जिससे अर्थव्यवस्था दोबारा रंगत में आने लगेगी। नई फसल आने लगी है। जिंसों के दाम घट रहे हैं। खाद्य मुद्रास्फीति लगातार दूसरे हफ्ते ऋणात्मक रही है। कंपनियों पर कच्चे माल की लागत का दबाव घट रहा है। रुपया इस हफ्ते 2.29 फीसदी मजबूत होकर 51.54 रुपए प्रति डॉलर हो चुका है। सरकार विनिवेश पर अपना पूरा ढर्रा ही बदल चुकी है।

उत्तर प्रदेश के चुनाव राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। कांग्रेस का हाथ मुलायम का साथ पकड़ सकता है और दीदी को बंगाल में चिल्लाते हुए छोड़ सकती है। मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई लाने का रुका हुआ फैसला फिर से अमल में लाया जा ससता है। सिंगल ब्रांड रिटेल में सौ फीसदी विदेशी निवेश की अधिसूचना 30 फीसदी खरीद देश के लघु व कुटीर उद्योग से खरीदने की शर्त के साथ जारी हो चुकी है। यह कदम राजनीतिक विरोध को ठंडा करने के साथ-साथ सरकार की दृढ़ता को दर्शाने के लिए किया गया है। सरकार साबित करना चाहती है कि वह कहीं से भी नीतिगत सुधारों में लकवाग्रस्त नहीं हुई है।

बाजार में निवेश की स्थिति की बात करें तो कुल बाजार पूंजीकरण में रिटेल निवेशकों का हिस्सा 5 फीसदी, एफआईआई का 14 फीसदी, बीमा व बैंकिंग का 7 फीसदी, प्रवर्तकों का 51 फीसदी और अन्य का 23 फीसदी हिस्सा है। इस 23 फीसदी अन्य में असली पेंच है। दिसंबर 2007 में अन्य का हिस्सा 16 फीसदी था। अब बढ़कर 23 फीसदी हो गया। कैसे, कहां से? बाजार यहां से उठा नहीं तो ये अन्य लोग बाहर कैसे निकलेंगे? ये सभी दीर्घकालिक निवेशक हैं और तेजी का दौर आने तक अपने पोजिशन को जमाने में लगे हैं।

जो सभी जानते हैं, उसके आधार पर अपनी रणनीति तैयार करना सरासर मूर्खता है। वैसे मैं तो क्या, कोई भी नहीं जान सकता कि आगे क्या होनेवाला है। कौन जानता था कि जापान में भूकंप व सुनामी का जलजला आनेवाला है!! उस जलजले ने पूरे वित्तीय बाजार को हिलाकर रख दिया था। यूरोप का ऋण संकट जब हाथ से निकलने लगा, तब सबको होश आया। अमेरिका को डाउनग्रेड कर दिया जाएगा, कौन जानता था? हमेशा कुछ घटनाएं ऐसी हो जाती हैं तो सभी को चौंका देती हैं। लेकिन घनघोर निराशावाद कभी नहीं फलता। जो भी होना है, उससे निपटने की तैयारी होनी चाहिए और नजरिया शॉर्ट का नहीं, लांग टर्म का होना चाहिए।

किसी भी रात में इतना दम नहीं कि वह सुबह के उजाले को रोक सके। यह तो चक्र है जो हमारी भावनाओं की परवाह किए बगैर स्वतंत्र रूप से अनवरत चलता रहता है।

(चमत्कार चक्री एक अनाम शख्सियत है। वह बाजार की रग-रग से वाकिफ है। लेकिन फालतू के कानूनी लफड़ों में नहीं पड़ना चाहता। इसलिए अनाम है। वह अंदर की बातें आपके सामने रखता है। लेकिन उसमें बड़बोलापन हो सकता है। आपके निवेश फैसलों के लिए अर्थकाम किसी भी हाल में जिम्मेदार नहीं होगा। यह मूलत: सीएनआई रिसर्च का कॉलम है, जिसे हम यहां आपकी शिक्षा के लिए पेश कर रहे हैं)

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