पश्चिमी ताकतें आईएमएफ पर ढीला करें शिकंजा, ब्रिक्स ने किया ऐलान

दुनिया की पांच सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था वाले देशों – ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका (ब्रिक्स) ने खुलकर आरोप लगाया है कि अमीर देशों ने पिछले पांच सालों से दुनिया को वित्तीय संकट में झोंक रखा है। उनकी मौद्रिक नीतियों ने विश्व अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। दिल्ली में ब्रिक्स के चौथे शिखर सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त घोषणापत्र में यह धारणाएं व्यक्त की गई हैं।

घोषणापत्र में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) में पश्चिमी ताकतों (अमेरिका व यूरोप) को इस साल अपने वोटिंग अधिकार कम कर देने चाहिए। मालूम हो कि 187 देशों की सदस्यता वाले आईएमएफ में अकेले अमेरिका का वोटिंग अधिकार 16.75 फीसदी है। वहीं यूरोप के छह प्रमुख देशों के ही वोटिंग अधिकार 21.26 फीसदी हैं। इनमें जर्मनी का वोटिंग अधिकार 5.81 फीसदी, फ्रांस का 4.29 फीसदी, ब्रिटेन का 4.29 फीसदी, इटली 3.16 फीसदी, नीदरलैंड 2.08 फीसदी और स्पेन का 1.63 फीसदी है।

यही वजह है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1945 में बनी दो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में से आईएमएफ का मुखिया हमेशा यूरोप का और विश्व बैंक का अध्यक्ष हमेशा अमेरिका का रहा है। आईएमएफ में ब्रिक्स देशों के कुल वोटिंग अधिकार अमेरिका से भी कम 11.03 फीसदी हैं। इसमें ब्राजील का वोटिंग अधिकार 1.72 फीसदी, रूस का 2.39 फीसदी, भारत का 2.34 फीसदी, चीन का 3.81 फीसदी और दक्षिण अफ्रीका का मात्र 0.77 फीसदी है। सऊदी अरब जैसे देश तक का वोटिंग अधिकार 2.80 फीसदी है जो ब्रिक्स के पांच में से चार देशों से ज्यादा है। गौरतलब है कि ब्रिक्स के देश दुनिया की तकरीबन आधी आबादी और विश्व अर्थव्यवस्था के पांचवें हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।

आईएमएफ में वोटिंग अधिकारों के बदलाव के पेशकश की जा चुकी है। लेकिन अमेरिका ने अभी इन्हें अनुमोदित नहीं किया है। गुरुवार को नई दिल्ली में ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन के बाद साफ-साफ कहा गया, “आईएमएफ के औचित्य और प्रभावोत्पादकता को सुनिश्चित करने के लिए सुधारों की गत्यात्मक प्रक्रिया जरूरी है। हम जोर देकर कहते हैं कि आईएमएफ की उधार क्षमता को बढ़ाने के प्रयास तभी सफल होंगे, जब संस्थान के सारे सदस्यों में भरोसा होगा कि वह 2010 के सुझारों को सचमुच लागू करने के प्रति प्रतिबद्ध है।”

ब्रिक्स देशों के शीर्ष नेताओं ने अमीर देशों पर आरोप लगाया कि उन्होंने पांच सालों से विश्व अर्थव्यवस्था की हालत डांवाडोल कर रखी है। साझा वक्तव्य में कहा गया है, “नितांत जरूरी है कि विकसित देश जिम्मेदार आर्थिक व वित्तीय नीतियां अपनाएं, अतिशय वैश्विक तरलता पैदा करने से बचें और ऐसे संरचनागत सुधारों को लागू करें जिससे आर्थिक विकास को गति मिले और रोजगार के अवसर पैदा हों।”

ध्यान दें कि अस्सी व नब्बे के दशक तक अमेरिका व यूरोप के नेतृत्व में जिन विकासशील देशों को संरचनागत सुधारों को अपनाने को कहा जाता था, वही देश अब पलटकर इन विकसित देशों पर नए सुधार अपनाने का दबाव डाल रहे हैं। पिछले कुछ दशकों में विश्व आर्थिक मंच पर बदले इस संतुलन पर गौर करना जरूरी है। गुरुवार को ब्रिक्स सम्मेलन में ब्राज़ील की राष्ट्रपति डिल्मा राउसेफ ने कहा कि अमीर देशों की मौद्रिक नीतियां विकसित देशों को बेइंतिहा व्यापारिक लाभ पहुंचाती है और दूसरों देशों की राह में अनुचित बाधाएं डालती हैं।
इन हालात के मुकाबला करने के लिए ब्रिक्स देशों ने आपसी व्यापार में अमेरिकी मुद्रा डॉलर की भूमिका घटाने का फैसला किया है। उन्होंने अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापारियों को ऋण सुविधा देने का फैसला किया है। इस सिलसिले में उन्होंने दो अलग-अलग समझौतों पर हस्ताक्षर किए। सम्मेलन के बाद ब्रिक्स का नेतृत्व अगले एक साल के लिए भारत को सुपुर्द कर दिया गया।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शिखर बैठक के बाद जारी वक्तव्य में कहा, ‘‘ब्रिक्स देशों में विकास संबंधी ऋण देने वाले बैंकों द्वारा आज जो समझौते किए गए हैं उससे हमारी अपनी मुद्राओं में ऋण की सुविधा होगी और व्यापार को बढ़ाने में मदद मिलेगी।’’ इस पहल से ब्रिक्स के बीच न केवल व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलेगा बल्कि वैश्विक आर्थिक संकट के समय भी सदस्य देशों की आर्थिक वृद्धि की संभावनाओं के संरक्षण में मदद मिलेगी।

सम्मेलन में अलग से ब्रिक्स विकास बैंक बनाने का भी सुझाव आया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि इस पर सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों द्वारा विचार किया जाएगा। उन्होंने कहा, ‘‘ब्रिक्स विकास बैंक की स्थापना के बारे में सुझाव आए हैं। हम लोगों ने अपने-अपने वित्त मंत्रियों को इस प्रस्ताव की समीक्षा कर अगले शिखर सम्मेलन तक रिपोर्ट देने के लिए कहा है।’’

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