sin

वेदांत कहता है कि पाप जैसी कोई चीज़ नहीं। हां, गलती ज़रूर होती है और, हमारी सबसे बड़ी गलती है खुद को कमज़ोर, पापी और दीनहीन, दयनीय समझना। यह समझना कि हम इतने गए-गुजरे हैं कि हमसे कुछ हो ही नहीं सकता।और भीऔर भी

हर कोई किसी न किसी रूप में बलवान है, सशक्त है। बस, हम ही हर रूप में कमजोर हैं, अशक्त हैं। ये सोच भयंकर अवसाद का लक्षण है। कोई दवा हमें इससे बाहर नहीं निकाल सकती। लड़ने का मनोबल और अपने अनोखे गुणों का भरोसा ही इसका इलाज है।और भीऔर भी

दिन की शुरुआत इससे करें कि किस-किस के प्रति कृतज्ञ हैं तो दिन बड़ा अच्छा गुजरता है। कृतज्ञता का भाव हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा और आत्मबल का संचार करता है, जबकि नाराजगी का भाव हमें शिथिल और कमजोर बना देता है।और भीऔर भी

बाहरी हालात तो सबसे लिए वही होते हैं। जो अंदर से मजबूत होते हैं, वे उनसे टकराकर पहले से और ज्यादा तेजस्वी होकर उभरते हैं। लेकिन जिनके अंदर के हालात कमजोर होते हैं, वे दबकर मिट जाते हैं।और भीऔर भी

ज़िंदगी में कभी कमजोर, कायर व भीरु लोगों से नाता नहीं बनाना चाहिए। उन पर रहम करो, लेकिन दूर से। पास बैठा लिया तो सिर पर चढ़कर ऐसी चिल्ल-पों मचाएंगे कि आपका चलना ही दूभर हो जाएगा।और भीऔर भी

जिसकी दुनिया बसी-बसाई है, सब कुछ जमा-जमाया है, वो भ्रमों में रहना गवारा कर सकता है। लेकिन जिसे सब कुछ नए सिरे से बनाना है, जमाना है, भ्रम उसके लड़ने की ताकत को कमजोर कर देते हैं।और भीऔर भी