ईमानदार अर्थव्यवस्था में लोग पूरा दम लगाकर कठिन कठोर मेहनत करते हैं क्योंकि उन्हें मेहनत का फल पाने का यकीन होता है। वे अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। जोखिम उठाते हैं। मौकों को हाथ से नहीं जाने देते। अंततः कुछ अपने उत्पाद और सेवा के दम पर कामयाब होते हैं तो कुछ किस्मत के दम पर। लेकिन कामयाबी और नाकामी में एक पैटर्न होता है। एक तरह की सच्चाई होती है। वहीं, जब अर्थव्यवस्था परऔरऔर भी

कोई अपने फायदे के लिए नोट छापे तो गुनाह है। लेकिन केंद्रीय बैंक नोट पर नोट छापता जाए और दावा करे कि वह ऐसा देश और देश की अर्थव्यवस्था के कल्याण के लिए कर रहा है तो उसे सही मान लिया जाता है। अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बरनान्के यही कर रहे हैं, किए जा रहे हैं। तीन महीने पहले 13 सितंबर को उन्होंने क्यूई-3 या तीसरी क्वांटिटेटिव ईजिंग की घोषणा की थीऔरऔर भी

मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं – ग़ालिब का ये शेर अभी तक अपुन पर पूरा फिट नहीं बैठा है। कारण, मुश्किलें तो पड़ती जा रही हैं, लेकिन आसां नहीं हो रहीं। इस चक्कर में फिर से आपकी सेवा में हाज़िर नहीं हो पा रहा। एक वजह यह भी है कि पेड सर्विस शुरू करने का मन नहीं बना पा रहा हूं। मेरा मानना है कि ज्ञान किसी की बपौती नहीं है और इसेऔरऔर भी

अमेरिका में ब्याज की दर इस समय 0.25% है। शायद यही वजह है कि वहां के लोग कर्ज लेकर जीने के आदी हो चुके हैं। 1972 में अमेरिका में बैंकों द्वारा बांटा गया कर्ज देश के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 112% था। 2008 में यह 296% हो गया। उसके बाद के चार सालों में यह घटा है। लेकिन अब भी जीडीपी का 250% है। हां, अमेरिका में मुद्रास्फीति की मौजूदा दर भी मात्र 1.70% है। विकसितऔरऔर भी

पिछले हफ्ते तक शेयर बाजार में मूड पस्ती का था। इस हफ्ते उत्साह का है। हफ्ते के पहले चार दिनों में सेंसेक्स नीचे में 15,748.98 से ऊपर में 16,680.59 तक 900 अंकों से ज्यादा की पेंग भर चुका है। हालांकि, आज आखिरी दिन माहौल थोड़ा सुस्त है। ऐसे में क्या मान लिया जाए कि अब पस्ती का आलम खत्म हो गया है और तेजी का नया क्रम शुरू हो रहा है। इस बीच मूलभूत स्तर पर अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी

दुनिया की दो शीर्ष अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में से विश्व बैंक पर अमेरिका का कब्जा बरकरार है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) पर यूरोप का नेतृत्व है। लेकिन रेटिंग एजेंसियों के मामले में अमेरिका का ही बोलबोला है। स्टैंडर्ड एंड पुअर्स, मूडीज़ व फिच तीनों ही प्रमुख एजेंसियां अमेरिका की हैं। इनको चुनौती देने की कोशिश में यूरोप काफी समय से लगा हुआ है। लेकिन अभी तक यह कोशिश किसी अंजाम पर नहीं पहुंच सकी है। असल में,औरऔर भी

भारत ने अमेरिका के आव्रजन नियमों के खिलाफ विश्व व्यापार संगठन (डबल्यूटीओ) में शिकायत दर्ज कराई है। उसका कहना है कि अमेरिका ने अपने यहां काम करने के वीज़ा की लागत जिस कदर बढ़ाई है, वह बहुत ज्यादा और सरासर गलत है। यह भारतीय आईटी कंपनियों के साथ किया जा रहा भेदभाव है। डब्ल्यूटीओ में भारत की यह शिकायत अभी दो पक्षों के बीच ‘विचार-विमर्श’ के स्तर पर है। यह वो स्तर है जहां पर इसे नऔरऔर भी

अमेरिका ने भारतीय आईटी प्रोफेशनलों में लोकप्रिय रोजगार वीज़ा एच-1बी का शुल्क पहली अक्टूबर से शुरू होने वाले अगले वित्त वर्ष से बढ़ाने का निर्णय किया है। भारतीय कंपनियों पर इसका नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है। इस वीजा के लिए आवेदन 2 अप्रैल से किए जाएंगे। अमेरिकी सिटीजनशिप एंड एमिग्रेशन सर्विसेज (यूएससीआईएस) ने एक बयान में कहा कि अमेरिका में 50 या इससे अधिक कर्मचारियों को काम पर रखनेवाली ऐसी कंपनियों के लिए एच1 वीजा आवेदनऔरऔर भी

विमान निर्माता कंपनी, बोईंग को अमेरिका की संघीय और राज्य सरकारों से अरबों डॉलर की अवैध सब्सिडी मिलती है और इसे तत्काल रोका जाना चाहिए। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने अपने दो साल पुराने इस फैसले को बहुत हद तक सही ठहराया है। डब्ल्यूटीओ ने यूरोपीय संघ की तरफ से साल 2005 में दाखिल शिकायत पर यह फैसला सुनाया है। हालांकि सब्सिडी की रकम को उसने यूरोपीय संघ के दावे से काफी कम माना है। डब्ल्यूटीओ नेऔरऔर भी

शुक्रवार को विदेशी निवेश बैंक मैक्वारी ने अपनी रिसर्च रिपोर्ट में आगाह किया था कि भारत को कच्चे तेल का झटका लग सकता है क्योंकि रुपए में इसकी कीमत अब तक की चोटी पर पहुंच चुकी हैं। तेल की ऊंची कीमतें मुद्रास्फीति को धक्का दे सकती हैं और ब्याज दरों को घटाए जाने की संभावना खत्म हो सकती है। मैक्वारी के बाद अब देश की दो प्रमुख रेटिंग एजेंसियों क्रिसिल और केयर रेटिंग्स ने कच्चे तेल केऔरऔर भी