चले अर्थव्यवस्था या दलाली का दम

ईमानदार अर्थव्यवस्था में लोग पूरा दम लगाकर कठिन कठोर मेहनत करते हैं क्योंकि उन्हें मेहनत का फल पाने का यकीन होता है। वे अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। जोखिम उठाते हैं। मौकों को हाथ से नहीं जाने देते। अंततः कुछ अपने उत्पाद और सेवा के दम पर कामयाब होते हैं तो कुछ किस्मत के दम पर। लेकिन कामयाबी और नाकामी में एक पैटर्न होता है। एक तरह की सच्चाई होती है। वहीं, जब अर्थव्यवस्था पर दलाल इस कदर हावी हो जाते हैं कि सत्ता तक को भी अपनी उंगलियों पर नचाते हैं, तब ईमानदार और सक्षम उत्पादक पिटते हैं, जबकि सत्ता के दलाल चांदी काटते हैं।

आपको लग रहा होगा कि यहां भारतीय अर्थव्यवस्था की बात हो रही है। लेकिन यही हकीकत अमेरिका की भी है। वहां भी जमकर घूसखोरी चलती है। यह अलग बात है कि उसे वहां लॉबीइंग कहा जाता है। अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट और निचले सदन प्रतिनिधि सभा के सदस्यों के तार कॉरपोरेट दुनिया से बड़ी गहरे व प्रत्यक्ष स्तर पर जुड़े रहते हैं। मसलन, अमेरिका की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा कंपनी, वेलप्वॉइंट के लिए लॉबी करनेवाली इलिज़ाबेथ फाउलर ने सीनेटर मैक्स बाउकस के साथ मिलकर कई नियमों को बनवाया और लागू भी करवाया। वही मैडम फाउलर दिसंबर 2012 में जॉनसन एंड जॉनसन के सरकारी मामलात व नीति समूह में सीनियर पद पर आसीन हो गईं।

दो हफ्ते पहले न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक खबर के मुताबिक, लॉबीइंग की बदौलत बड़े फ्रॉड के मामले में फंसी बायोटेक्नोलॉजी फर्म, एमगेन तक को फिस्कल क्लिफ के दुष्प्रभाव से बचा लिया गया है। वह भी तब जब कंपनी ने खुद फ्रॉड की बात कुबूल कर ली थी। बिना कंपनी का नाम लिए उसे 50 करोड़ डॉलर का फायदा पहुंचा दिया गया। आप जानते ही होंगे कि फिस्कल क्लिफ के तहत अमेरिकी सरकार के खर्चों में कटौती और लोगों पर टैक्स बढ़ाने का प्रस्ताव है। एमगेन दुनिया की सबसे बड़ी बायोटेक्नोलॉजी कंपनी है। फिस्कल क्लिफ से उसकी दवाओं की सरकारी खरीद भी रुक जाती। लेकिन कंपनी की तरफ से 74 लॉबीइंग करनेवाले काम पर डट गए और उन्होंने सरकारी प्रस्ताव से धारा 632 ही निकलवा दी।

इसके बाद तय हो गया कि सरकार अगले दो सालों तक किडनी की डायलिसिस दवा, सेन्सीपार खरीदती रहेगी और यह दवा सरकारी खर्चों में कटौती से बाहर रखी जाएगी। इस दवा की इकलौती निर्माता एमगेन है। खबरों के मुताबिक एमगेन 2007 से लेकर अब तक अमेरिका के राजनेताओं को 50 लाख डॉलर का चंदा दे चुकी है। लेकिन स्वीडन की कंपनी इलेक्टा एबी इतनी भाग्यशाली नहीं रही। इलेक्टा रेडिएशन से जुड़े उपकरण बनाती। वह आखिरी वक्त पर कानून को अपने पक्ष में नहीं मोड़ सकी। दिक्कत यह है कि वो विदेशी कंपनी है और इन नाते वह राजनेताओं को सीधे-सीधे धन नहीं दे सकती। वहीं उसकी प्रतिद्वंद्वी अमेरिकी कंपनी वैरियन अपने मकसद में कामयाब रही क्योंकि अमेरिकी कानून उसे लॉबीइंग करने की खुली छूट देता है। उसने 18 लॉबीइंग करनेवाले काम पर लगा दिए। अपना हित तो पूरा किया ही, साथ में इलेक्टा का भुगतान आधा करवा दिया।

जब दुनिया की सबसे बड़ी बाज़ार अर्थव्यवस्था, अमेरिका का हाल यह है तो कैसे माना जा सकता है कि भारत मे बाज़ार के विकसित हो जाने के बाद अभी की सारी बुराइयां खत्म हो जाएंगी? लोकतंत्र में जनता का अंकुश ही सबसे कारगर होता है। इसको मजबूत करने से हमारा लोकतंत्र ही नहीं, बाजार व्यवस्था भी ज्यादा संतुलित, निष्पक्ष और सबके काम की बन सकती है।

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