कोई भी समझदार व्यक्ति कम रिस्क में ठीकठाक कमाने का मौका नहीं गंवाता। उसे ज्यादा रिटर्न खींचता जरूर है, लेकिन उससे जुड़ा ज्यादा रिस्क उसे डराता भी है। इसीलिए हममें तमाम लोग शेयरों के बजाय रीयल एस्टेट, सोने व एफडी में पैसा लगाते हैं। इधर विदेशी संस्थागत निवेशको को लग रहा है कि अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं तो वे भारत जैसे देशों से निवेश निकालकर वापस ले जा रहे हैं। अब आज की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्त मंत्री चिदंबरम आज लोकसभा में 11 बजे आनेवाले वित्त वर्ष 2014-15 का अंतरिम बजट पेश करेंगे। इसमें वे प्रत्यक्ष या परोक्ष टैक्स की दरों में कोई फेरबदल नहीं कर सकते क्योंकि कानून इसकी इजाज़त नहीं देता। पर आम चुनावों के मद्देनज़र बड़ी-बड़ी बातें जरूर कर सकते हैं। बाज़ार की नज़र इस पर रहगी कि वे राजकोषीय घाटे को 4.8% की सीमा में बांध सके या नहीं और हां तो कैसे। अब करते हैं हफ्ते का आगाज़…औरऔर भी

बाज़ार गिरता है ज्यादा बिकवाली से और बढ़ता है ज्यादा खरीदारी से। आमतौर पर बिकवाली या खरीदारी का रुख देश-विदेश की ताज़ा आर्थिक स्थिति और भावी संभावना से तय होता है। बुधवार को जब आंकड़े आए कि देश में रिटेल मुद्रास्फीति जनवरी में उम्मीद से ज्यादा घटकर दो सालों के न्यूनतम स्तर पर आ गई तो माना गया कि बाज़ार बढ़ेगा। लेकिन वो गिर गया। आज थोक मुद्रास्फीति के आंकड़े आने हैं। देखिए, कैसा रहता है बाज़ार…औरऔर भी

शेयर बाज़ार एक जैसी जगह है कि जहां लंबा/लांग होने से कहीं ज्यादा फायदा छोटा/शॉर्ट होने में है। दरअसल, शॉर्ट सौदे केवल फ्यूचर्स और ऑप्शंस सेगमेंट में शामिल शेयरों में किए जा सकते हैं और वहां लीवरेज़ काफी ज्यादा होता है। कम पूंजी में बड़े सौदे और बड़ा मुनाफा। शेयर एक दिन में 2% गिरा तो आप 20% तक कमा सकते हैं। लेकिन सीधा-सा नियम है कि रिवॉर्ड ज्यादा तो रिस्क भी ज्यादा। अब गुरुवार की बौद्ध-ट्रेडिंग…औरऔर भी

अगर आपको कहीं अंदर से लगता है कि शेयर बाज़ार को सिर्फ बढ़ना ही बढ़ना है तो आप अभी निवेश/ट्रेडिंग के लिए तैयार नहीं हैं। अर्थव्यवस्था में सुस्ती/मंदी भी आएगी और शेयर बाज़ार में गिरावट भी आएगी। यह अकाट्य सत्य है। अगर यह आपके गले नहीं उतरता तो आप यथार्थ नहीं, भ्रम में जी रहे हैं। और, भ्रमों की दुनिया में ख्याली पुलाव पकाए जा सकते हैं, कमाई नहीं की जा सकती। अब बुधवार का ट्रेडिंग बौद्ध-सूत्र…औरऔर भी

अलग-अलग टाइमफ्रेम की ट्रेडिंग के नियम व तनाव अलग हैं। इंट्रा-डे में आपको उस तरह चौकन्ना रहता पड़ता है जैसे आप छह महीने के छोटे बच्चे की देखभाल कर रहे हों। वहीं फ्यूचर्स व ऑप्शंस में आपको दो दिन में सौदा काटकर निकल जाना चाहिए। उसमें भी चौकन्ना रहना बेहद जरूरी है। लेकिन स्विंग व मोमेंटम ट्रेड में कोई खास तनाव नहीं। दिन में जब चाहे सौदा करो। अपने मिजाज के हिसाब से टाइमफ्रेम चुनें। अब आगे…औरऔर भी

छोटे-मोटे शेयरों की बात अलग है। लेकिन पूरे बाज़ार की चाल इस वक्त डॉलर की चाल से जुड़ चुकी है। इस अमेरिकी मुद्रा ने भारत ही, दुनिया भर के बाज़ारों में खरमंडल मचा रखा है। पिछले साल मई से उसका तूफान कुछ ज्यादा ही बढ़ गया। टैपरिंग भयंकर चक्रवात की तरह हर वक्त बाज़ारों के सिर पर मंडराता रहता है। बांड खरीद के घटने-बढ़ने से बाज़ार की सांस उठती-गिरती है। ऐसे में परखते हैं बाज़ार की चाल…औरऔर भी

हर दिन हमारे अपने शेयर बाज़ार मं डेढ़ से दो लाख करोड़ रुपए इधर से उधर होते हैं। ब्रोकर समुदाय तो इस पर 0.1% का कमीशन भी पकड़ें तो हर दिन मजे से 200 करोड़ रुपए बना लेता है। लेकिन हमारे जैसे लाखों लोग ‘जल बिच मीन पियासी’  की हालत में पड़े रहते हैं। बूंद-बूंद को तरसते हैं। सामने विशाल जल-प्रपात। लेकिन हाथ बढ़ाकर पानी की दो-चार बूंद भी नहीं खींच पाते। पास जाएं तो जल-प्रपात झागऔरऔर भी

बाज़ार सोम को गिरा, मंगल को उठा, बुध को जस का तस पड़ा रहा। गुरु को खुला तो बढ़त के साथ। लेकिन अचानक 1.25% का गोता लगातार उठा तो थोड़ी बढ़त लेकर बंद हुआ। बाज़ार आखिर जाना कहां चाहता है? हम नहीं जानते। ट्रेडर को इससे मतलब भी नहीं होना चाहिए। उसका तो मकसद है जो भी दिशा हो, उसे पकड़कर लाभ कमाना। कयासबाज़ी विश्लेषकों के पापी पेट का सवाल है, उसका नहीं। इसलिए पकड़ते हैं दिशा…औरऔर भी

किसी समय रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को शेयर बाज़ार का किंग कहा जाता था। इसके मुखिया धीरूभाई अंबानी के बारे में माना जाता था कि बाज़ार उनके इशारों पर नाचता है। जुलाई 2002 में उनके देहांत के बाद भी माना गया कि बाज़ार में अंबानी भाइयों की तूती बोलती है। लेकिन 2005 से यह स्थिति बदलने लगी। अब बाज़ार में एफआईआई समेत ऐसे खिलाड़ी आ गए हैं जो बाज़ार की दिशा तय करते हैं। इसके मद्देनजर बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी