कल बाज़ार बंद होने के बाद खबर आई कि औद्योगिक उत्पादन जून में घट गया, रिटेल मुद्रास्फीति जुलाई में बढ़ गई। शेयरों के भाव ऐसी खबरों से कहीं ज्यादा अंतरराष्ट्रीय जगत और कंपनियों की हलचलों से प्रभावित होते हैं। लालच होता है कि हम भी खबरों पर ट्रेडिंग करें तो जमकर कमा लें। लेकिन यह मृग-मरीचिका है। खबरें पहुंचती हैं हमसे कहीं पहले, ऑपरेटरों तक। हमारे लिए तो चार्ट ही सहारा हैं। अब चलाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ट्रेडिंग तो हर कोई पैसे बनाने के लिए करता है। लेकिन कुछ लोगों का ज्यादा ध्यान इस बात रहता है कि बाज़ार की चालढाल को अच्छी तरह समझकर बेहतर ट्रेडर कैसे बना जाए। वे दूसरों से मिली हर टिप या जानकारी को खुद परखते हैं और अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ट्रेडिंग सिस्टम विकसित करते हैं। घाटा खाने पर सिर नहीं धुनते, बल्कि इसकी वजह समझकर कमियां दूर करते हैं। अब बढ़ते हैं मंगलवार की ट्रेडिंग की ओर…औरऔर भी

ट्रेडिंग में सारा खेल शांत रहने का है। जो जितना शांत है, बाज़ार पर छाई भावनाओं और सामनेवाले की स्थिति को उतना अच्छा समझ सकता है। हालांकि जब आप फायदे में हो, तब तक शांत रहना बड़ा आसान है। लेकिन घाटा लगते ही बड़े-बड़े दिग्गज सारा धैर्य/शांति गंवा बैठते हैं। जो घाटा लगने पर भी भावनाओं को बुद्धि पर हावी नहीं होने देते, वे ही आखिरकार कामयाब ट्रेडर बनते हैं। चलिए अब परखते हैं सोमवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अमेरिकी बाज़ार भयंकर रिस्क के मुहाने पर खड़ा है। यह रिस्क फटा तो भारत समेत दुनिया भर के बाज़ार टूट सकते हैं। वैश्विक विश्लेषक डग शॉर्ट के अध्ययन के मुताबिक अमेरिकी शेयर सूचकांक को मुद्रास्फीति से समायोजित कर 140 सालों की ट्रेंड लाइन खीचें तो बाज़ार अभी उस रेखा से करीब 86% ऊपर है। 1929 की महामंदी से ठीक पहले यह 81% ऊपर था। ऐसे में सीखनी होगी अफरातफरी में कमाने की कला। अब शुक्र का वार…औरऔर भी

लंबे समय में शेयरों के भाव कंपनी के फंडामेंटल्स से तय होते हैं। लेकिन छोटे समय में न तो ये बदलते हैं और न ही इनकी खास अहमियत होती है। छोटे समय में सबसे ज्यादा अहम है जोखिम से बचने या रिस्क अवर्जन की मनःस्थिति। इसे नापने का बाकायदा गणितीय फॉर्मूला है। ट्रेडिंग के कुछ मॉडल इसी आधार पर भावी भाव का अनुमान लगाते हैं। मूल बात है संभावनाओं को समझना। अब करते हैं गुरुवार का प्रस्थान…औरऔर भी

ब्याज दर जस-की-तस तो बाज़ार बढ़ा सहज गति से। छोटी अवधि में शेयरों के भाव जिस दूसरी बात से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं वो है निवेशकों की रिस्क उठाने की मानसिकता। अगर वे रिस्क लेने से डरते हैं तो भाव गिरते हैं और बगैर खास परवाह किए रिस्क उठाते हैं तो भाव चढ़ते हैं। ट्रेडिंग में अक्सर कंपनी के फंडामेंटल्स नहीं, दांव लगाने की मानसिकता का वास्ता होता है शेयरों के बढ़ने से। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

किसी शेयर का मूल्य कंपनी के भावी अनुमानित कैश फ्लो को आज तक डिस्काउंट कर के निकाला जाता है। कैश फ्लो कंपनी के अंदर की चीज़ है, जबकि डिस्काउंट दर बाहर की। डिस्काउंट दर के दो निर्धारक तत्व होते हैं सरकारी बांडों की अल्पकालिक ब्याज और निवेशकों में रिस्क से बचने की प्रवृत्ति। रिस्क की प्रवृत्ति पर फिर कभी। अभी यह जानें कि ब्याज बढ़ने पर शेयर का मूल्य घट जाता है। कैसे मिलेगा आज इसका सबूत…औरऔर भी

इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारतीय शेयर बाज़ार से रिटेल निवेशक गायब हैं और इस पर संस्थागत निवेशक हावी हैं। इन निवेशकों में भी 49% हिस्से के साथ एफआईआई सब पर भारी हैं। बीमा कंपनियों का हिस्सा इसमें करीब 20% है। कुछ जानकार बताते हैं कि आम चुनावों के नतीजों के बाद भारतीय शेयरों में लगा दो-तिहाई धन विदेशी निवेशकों का ही है। इस सच की रौशनी में बनाते हैं ट्रेड की रणनीति…औरऔर भी

समय और उसके साथ निरतंर विकास। जीवन के तमाम क्षेत्रों की तरह निवेश में भी इन्हीं दो पक्षों का ध्यान रखना पड़ता है। चाहने से चंद दिन में पौधा पेड़ नहीं बनता। यह भी सही है कि बोया पेड़ बबूत का तो आम कहां से होए। कंपनियां अच्छी चुनो। फिर देखो चक्रवृद्धि दर का कमाल। कंपनी के साथ आपका धन कुलांचे मारता बढ़ेगा। दीर्घकालिक निवेश की सेवा तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी, जिसे बढ़ना है आगे…औरऔर भी

ज्यादातर लोगों पर शेयरों की ट्रेडिंग का ऐसा जुनून सवार रहता है कि उन्हें अपने सिवाय कुछ नहीं दिखता। नहीं दिखता कि बाज़ार बनता ही है ठीक एक समय परस्पर विरोधी सोच के संयोग से। वर्तमान भाव पर दोनों की समान राय, लेकिन भावी मूल्य पर एकदम उलट। एक सोचता है बढ़ेगा तो खरीदता है। दूसरा सोचता है गिरेगा तो बेचता है। आत्ममोह के इस सम्मोहन से निकलना ज़रूरी है। अब पकड़ते हैं अगस्त का पहला ट्रेड…औरऔर भी