अमेरिका में आर्थिक मंदी की आशंका। चीन की आर्थिक विकास दर 2.7% रह जाने का अनुमान। साथ ही समूची विश्व अर्थव्यवस्था बहुत बढ़ी तो 2023 में 2.7% बढ़ सकती है। ऐसे में भारत इस साल 2022-23 में 6.9% और नए साल 2023-24 में 5-6% भी बढ़ जाए तो दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहेगा। ऐसे में हम भारतीय बड़े आराम से गाल फुलाकर हनुमान बनने के सरकारी स्वांग के झांसे में आ सकतेऔरऔर भी

अमेरिका की सिर चढ़ी मुद्रास्फीति और उसे थामने के लिए बढ़ाई जा रही ब्याज दरें वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए संकट का सबब बनी हुई हैं। वहां पिछले दस सालों में औसत मुद्रास्फीति 1.88% रही है। लेकिन बीते वर्ष 2022 में यह 8% पर पहुंच गई। नवंबर में यह घटकर 7.1% पर आ गई। लेकिन जानकारों का मानना है कि भले ही यह दर शीर्ष पर पहुंचकर नीचे उतरी हो। लेकिन सरकारी नीतियों के चलते यह फिर पलटकरऔरऔर भी

विश्व बैंक ने दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन की विकास दर का अऩुमान घटाकर 2.7% कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) का आकलन है कि विश्व अर्थव्यवस्था साल 2022 में भले ही 3.2% बढ़ जाए, लेकिन इस साल 2023 में वह ज्यादा से ज्यादा 2.7% ही बढ़ सकती है। यह साल 2001 के बाद की सबसे कम विकास दर होगी, अगर हम 2008 के वित्तीय संकट और 2020 की कोरोना महामारी की विशिष्ट स्थिति कोऔरऔर भी

साल 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट से उपजी आर्थिक मदी से निपटने के लिए अमेरिका ने क्वांटिटेटिव ईजिंग या नोट छापकर सिस्टम में डालने का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि दुनिया भर में वित्तीय बाज़ार, खासकर शेयर बाज़ार से मूल अर्थव्यवस्था का बुनियादी रिश्ता-नाता ही टूट गया। अमेरिका, जापान व यूरोप जैसे देशों से सस्ता धन निकलता है और दुनिया भर के देशों के शेयर बाज़ार की दशा-दिशा तय कर देता है। फिर भी इधर साल भरऔरऔर भी

समय की रिले रेस जारी है। साल 2022 बैटन साल 2023 के हाथों में सौंपकर कट लिया। पूरे साल के दौरान 3 जनवरी से 30 दिसंबर तक निफ्टी मात्र 2.72% और सेंसेक्स 2.80% बढ़ा है। वैसे, भारतीय शेयर बाज़ार के इतिहास में दूसरी बार शीर्ष सूचकांक लगातार सात साल बढ़े हैं। पहली बार ऐसा 1988 से 1994 तक हुआ था। लेकिन अगले ही साल 1995 में सेंसेक्स 20.79% टूट गया था। साल 2008 की वैश्विक मंदी सेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में साल 2022 की ट्रेडिंग का अंतिम दिन। वैसे यह साल ऐतिहासिक चुनौतियों से भरा साल रहा। विश्व स्तर पर 50 सालों की सबसे ज्यादा मुद्रास्फीति। लगभग 40 सालों में ब्याज दरें बढ़ाने का सबसे ज्यादा कठिन कठोर सिलसिला। 20 सालों में अमेरिकी डॉलर की सबसे ज्यादा मजबूती और दुनिया की तमाम मुद्राओं की हालत उसके आगे खराब होते जाना। साथ ही दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन में 45 सालों से ज्यादा अवधिऔरऔर भी

साल के अंत में फुरसत से समीक्षा करने की ज़रूरत है कि ट्रेडिंग में क्या पाया और क्यों गंवाया। साथ ही सतर्कता भी चाहिए कि शेयर बाज़ार के प्रमुख खिलाड़ी क्या कर रहे हैं, खासकर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) और म्यूचुअल फंडों की सक्रियता क्या है? ताज़ा जानकारी के मुताबिक म्यूचुअल फंडों में एसआईपी के जरिए नियमित धन करनेवाले निवेशकों ने सितबंर से नवंबर तक के तीन महीनों में 22,110 करोड़ रुपए निकाले हैं। दूसरी तरफ एफपीआईऔरऔर भी

शेयर बाज़ार समेत समूचे वित्तीय बाज़ार में सक्रिय ट्रेडर के लिए सबसे अहम है उसकी सतर्कता। लम्बे निवेश में तो एक बार ठोंक-बजाकर कंपनी के शेयर खरीद लिए और फिर सालों के लिए सो गए तो कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में तो सावधानी हटी, दुर्घटना घटी की स्थिति हमेशा बनी रहती है। ट्रेडर को बराबर देखते रहना पड़ता है कि दूसरे खिलाड़ी क्या कर रहे हैं। खासकर, म्यूचुअल फंडों और विदेशी पोर्टफोलियोऔरऔर भी

साल का आखिरी हफ्ता काम-धंधे और व्यस्तता का नहीं, बल्कि फुरसत का होता है। आमतौर पर कॉरपोरेट क्षेत्र से लेकर मीडिया के सीनियर लोग और तमाम प्रोफेशनल क्रिसमस से लेकर नया साल तक 10-12 दिन की छुट्टियां बाहर ही मनाते हैं। रिटेल ट्रेडर को भी इस वक्त का इस्तेमाल शांति से गुजरते साल की समीक्षा करते हुए बिताना चाहिए ताकि साफ हो सके कि साल के दौरान उसने क्या-क्या गलतियां कीं और क्या-क्या सबक सीखे। उसे समझनाऔरऔर भी

पता ही नहीं चला। देखते ही देखते साल बीतने को आ गया। साल 2022 का आखिरी सप्ताह। हिसाब-किताब लगाने का समय कि इस साल कितना पाया, कितना गंवाया। भारी उतार-चढ़ाव से गुजरे इस साल में निफ्टी-50 सोमवार, 3 जनवरी से शुक्रवार, 23 दिसंबर तक मात्र 1.03% बढ़ा है। यह साल भर में शेयर बाज़ार का बेहद निराशाजनक प्रदर्शन माना माना जाएगा। क्या आपने शेयर बाज़ार में निवेश से कम से कम इतना और ट्रेडिंग से इसका पांच-दसऔरऔर भी