मनोरंजन का सच्चा साधन तो हमारे सपने हैं जिनका फलक बढ़ाते रहना जरूरी है। इसलिए जमकर जानो ताकि यथार्थ के हर पहलू को छू सको और जमकर सोओ ताकि सपने हर पहलू को नया विन्यास दे सकें।और भीऔर भी

बहुत कम लोग हैं जिन पर देश-दुनिया का फर्क पड़ता है। इनमें से भी ज्यादातर लोग भावना में बहकर पूरा सच नहीं देख पाते, गुमराह हो जाते हैं। स्वार्थ में धंसे दुनियादार लोग उन पर हंसते है, तरस खाते हैं।और भीऔर भी

आप खुद को कितना भी बडा़ तोप-तमंचा समझते रहें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं और यह सोच खुद नहीं बनती, सायास बनानी पड़ती है।और भीऔर भी

हम अपनी ही आभा की झूठी चकाचौंध और भ्रमों के बोझ तले इस कदर दबे रहते हैं कि असली सच को देख नहीं पाते। वह सच, जो हम से पूरी तरह स्वतंत्र है, जिससे हमारी पूरी दुनिया संचालित होती है।और भीऔर भी

विचार जब तक धारा का हिस्सा हैं, तब आप उनमें गोता लगाकर आगे से आगे बढ़ते चले जाते हैं। लेकिन विचारधारा में बंधते ही आपका बढ़ना रुक जाता है और यथार्थ आपकी मुठ्ठी से फिसलने लगता है।और भीऔर भी

जमाना हम से है, हम जमाने से नहीं – जैसी बातें मुंह फुलाकर हनुमान बनने से ज्यादा कुछ नहीं। जमाना हमारे बगैर भी चलता है और चलता रहेगा। हमें जमाने को समझने की जरूरत है, न कि जमाने को हमें।और भीऔर भी

अपनी इच्छाओं को आरोपित करने के बजाय हमें उन्हें यथार्थ के हिसाब से सजाना चाहिए। यथार्थ सतह से उभरा अंकुर ही नहीं, सतह के नीचे पड़ा बीज भी होता है। इसी त्रिकाल दृष्टि से पूरी होती हैं इच्छाएं।और भीऔर भी

गुमान रहता है कि हम ये कर डालेंगे, वो कर डालेंगे। हालात से टकराकर हकीकत सामने आती है तो हम जीरो बन जाते हैं। लेकिन यही जीरो जरूरी जज्बे का साथ पाकर आपको फिर से हीरो बना सकता है।और भीऔर भी

हर कोई भविष्य जानता चाहता है, उसकी झलक पाना चाहता है। लेकिन जब हम समय के साथ वाकई वहां पहुंच जाते हैं, तब पता चलता है कि हम उसके बारे में कितना ऊटपटांग सोचते थे।और भीऔर भी

उसे प्रकृति कहिए या भगवान, उसकी बनाई हर चीज अपूर्ण होती है, आदर्श नहीं। आदर्श तो इंसान ने अपनी प्रेरणा के लिए बनाए हैं। इसलिए इंसान की किसी भी रचना को यथार्थ का पैमाना मानना सही नहीं।और भीऔर भी