साध्य या साधन
भगवान और धर्म की शुरुआत समाज में सुख-शांति के साधन के रूप में हुई थी। सदियों तक सब कुछ राजी-खुशी चलता रहा। समस्या तब से शुरू हुई जब इन्हें साधन के बजाय साध्य बना दिया गया।और भीऔर भी
भगवान और धर्म की शुरुआत समाज में सुख-शांति के साधन के रूप में हुई थी। सदियों तक सब कुछ राजी-खुशी चलता रहा। समस्या तब से शुरू हुई जब इन्हें साधन के बजाय साध्य बना दिया गया।और भीऔर भी
इस जहां में सिर्फ एक चीज है जिस पर इंसान का वश नहीं है। वो है समय और उसी से संचालित होता जीवन-मरण का चक्र। बाकी किसी भी चीज की काट नियमों को समझकर निकाली जा सकती है।और भीऔर भी
व्यक्ति पर प्रभाव बाहर के होते हैं, असर अंदर से होता है। लेकिन व्यक्तियों से बने समाज में खामी संरचनागत होती है। इसलिए व्यक्ति व समाज की समस्याओं का निदान कभी एक जैसा नहीं होता।और भीऔर भी
यहां तक कि अमेरिकी बाजार भी करीब 330 अंक उठने के बाद अंत में 147 अंकों की बढ़त लेकर बंद हुआ। लेकिन अपना शेयर बाजार सपाट खुला और मुनाफावसूली के चलते गिरता चला गया। या, इसे आप रोलओवर का असर भी मान सकते हैं। निफ्टी 0.51 फीसदी की गिरावट के साथ 4945.90 पर बंद हुआ, जबकि 0.47 फीसदी की गिरावट के साथ 16,446.02 पर। यूं तो निफ्टी के 4860 तक गिरने के आसार अब भी बने हुएऔरऔर भी
बीच की राह नहीं। या तो अपना स्वार्थ या औरों का हित। दोनों ही सही हैं। एक आज तो दूसरा कल के लिए। दिक्कत उनके साथ होती है जो न तो अपना स्वार्थ समझ पाते हैं और न ही औरों की जरूरत।और भीऔर भी
तीन तरह के लोग होते हैं। एक, जिनके लिए कोई समस्या नहीं होती। दो, जो मानते हैं कि समस्या तो है, पर समाधान नहीं। तीन, जो मानते हैं कि समस्या है और इसे हल भी किया जा सकता है।और भीऔर भी
समस्याओं का होना कोई बुरी बात नहीं, अगर हम उनसे जूझने को तैयार हों। देखें कि कौन-सी समस्या व्यक्तिगत है और कौन-सी व्यवस्था-जन्य क्योंकि इनसे निपटने के तरीके भिन्न होते हैं।और भीऔर भी
किसी समस्या का विकराल या मामूली लगना इससे तय होता है कि हम सो रहे हैं या जग रहे हैं। सोते वक्त जरा-सी समस्या भी भयावह लगती है। इसलिए पहले नींद से निकलें, फिर समस्या से लड़ाएं पंजा।और भीऔर भी
अगर हर दिन आपके भीतर कोई नया विचार नहीं कौंधता, गुत्थियों से भरे इस संसार में किसी गुत्थी को सुलझाने का हल्का-सा सिरा भी नहीं मिलता तो समझ लीजिए कि आप जीते जी मर चुके हैं।और भीऔर भी
रोजमर्रा की उलझनों को नहीं सुलझाते तो एक दिन ये उलझनें आपको ही ‘सुलझा’ देती हैं। तब आप किस्मत का रोना रोते हैं, जबकि थोड़े तनाव से बचने के लिए ये हालात आपने खुद ही पैदा किए होते हैं।और भीऔर भी
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