सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका अगर टैपरिंग या बॉन्ड खरीदने की रफ्तार नवंबर महीने से धीमी करता है तो भारत पर क्या असर पड़ेगा। सीधी-सी बात है कि विदेशी निवेशक हमारे बॉन्ड और शेयर बाज़ार से निकलने लगेंगे। इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार कम होगा। साथ ही जो डॉलर अभी 75 रुपए का मिल रहा है, वह हो सकता है कि 78 रुपए का मिलने लगे। इससे हमें विदेशी ऋणों की अदायगी पर ज्यादाऔरऔर भी

अमेरिकी सरकार के बांड दुनिया में सबसे सुरक्षित माने जाते हैं क्योंकि उनमें डिफॉल्ट का रिस्क शून्य होता है। इन बांडों पर ब्याज दर बढ़ते ही निवेशक शेयर बाजार जैसे सबसे ज्यादा रिस्क वाले माध्यम से निकलकर इनकी तरफ भागते हैं। बांड में ज्यादा निवेश का मतलब अमेरिकी सरकार पर ऋण का बढ़ते जाना। इससे निवेश का तो नहीं, लेकिन सिस्टम का रिस्क बढ़ जाता है। इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस के मुताबिक दुनिया भर में चढ़े ऋणऔरऔर भी

अमेरिका में बांड की कम खरीद से ब्याज दरें और ज्यादा बढ़ने लगेंगी। वहां के दस साल के सरकारी बांडों पर यील्ड की दर इस साल पहले ही 0.9% से बढ़कर 1.69% हो चुकी है। जब एफपीआई हमारे बांडों व स्टॉक्स से निकलने लगेंगे तो हमारा विदेशी मुद्रा भंडार हल्का होने लगेगा। तब पता चलेगा कि हम जिस भंडार पर इतरा रहे हैं, वह दरअसल रेत के रेगिस्तानी टीले जैसा है। वैसे भी इधर केंद्र सरकार केऔरऔर भी

विदेशी निवेश खासकर, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई / एफआईआई) का शुद्ध मकसद भारत जैसे देशों के वित्तीय बाज़ार से झटपट ज्यादा कमाकर फुर्र हो जाना है। वे कतई इसकी परवाह नहीं करते कि उनके अचानक निकल जाने से उस देश के वित्तीय बाज़ार और खासकर उसकी मुद्रा पर कितना प्रतिकूल असर पड़ेगा। पिछली बार अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने दिसंबर 2013 में 85 अरब डॉलर के बजाय 75 अरब डॉलर के बांड खरीदने शुरू किए।औरऔर भी

इस साल 1 अप्रैल से 8 अक्टूबर तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6253.2 करोड़ डॉलर बढ़ा है। इसमें से खालिश विदेशी मुद्रा 4030.8 करोड़ डॉलर है जिसमें से 483.20 करोड़ डॉलर (11.99%) विदेशी पोर्टफोलियो निवेश है जो बांड या शेयर बाज़ार में लगा है। जो लोग देश में विदेशी मुद्रा भंडार के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने को बड़ी उपलब्ध बताते हैं, उन्हें जानना चाहिए कि घरेलू बचत में आ रही भारी कमी को विदेश से आयाऔरऔर भी

अमेरिका का केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व अगर नवंबर-मध्य से बांड खरीदने की रफ्तार धीमी कर देता है तो इसका क्या असर पड़ेगा? इससे पहले उसने मई 2013 में जब बांड खरीद घटाने या टैपरिंग की घोषणा की थी तो बाज़ार में अचानक ब्याज दरें बढ़ने लगीं। सरकारी बांडों पर यील्ड की दर बढ़ गई। उसने जब टैपरिंग की पूरी योजना पेश की, तब तो बांड के मूल्य इतना घट गए कि उनकी यील्ड काफी बढ़ गई। अमेरिकीऔरऔर भी

सिस्टम में धन का प्रवाह बढ़ने से ब्याज दर घटने लगती हैं। इससे जहां उद्योग, व्यापार व उपभोक्ताओं को सहूलियत हो जाती है, वहीं जिनके पास सीमित पूंजी है और जो एफडी या बांड जैसे ऋण-प्रपत्रों पर मिलनेवाले ब्याज की आय पर निर्भर हैं, उनके लिए मुश्किल हो जाती है। वे ज्यादा रिटर्न पाने के लिए रिस्की निवेश माध्यमों की तरफ जाने को मजबूर हो जाते हैं। यही वजह है कि अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे विकसितऔरऔर भी

किसी भी देश का केंद्रीय बैंक सरकारी बांड व प्रतिभूतियां खरीदता है तो सिस्टम में धन का प्रवाह बढ़ जाता है और धन की लागत या ब्याज दर घट जाती है। उद्योग व व्यापार जगत इसका लाभ उठाते हैं। अमेरिका ही नहीं, यूरोप व जापान तक ऐसा हो चुका है। अपने यहां भी रिजर्व बैंक से सिस्टम में धन का प्रवाह बढ़ाने की मांग होती रही है। इसमें केंद्रीय बैंक को नोट नहीं छापने पड़ते, बल्कि बढ़ीऔरऔर भी

अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने साफ कर दिया है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को मदद करने के लिए बाज़ार से बांड खरीदकर सिस्टम में डॉलर डालने का सिलसिला इसी नवंबर के दूसरे हफ्ते से धीमा कर सकता है। जब से कोरोना की महामारी का झटका लगा है, तभी से वह हर महीने बाज़ार से 80 अरब डॉलर के ट्रेजरी बिल और 40 अरब डॉलर के मोर्टगेज बैक्ड सिक्यूरिटीज (एमबीएस) खरीदकर सिस्टम में धन डालता रहाऔरऔर भी

फाइनेंस की दुनिया का सरगना, सरताज़ और शहंशाह है अमेरिका। वहां की हर हरकत से दुनिया भर के वित्तीय बाजार प्रभावित होते हैं। साल 2008 में लेहमान ब्रदर्स से पैदा हुआ संकट समूची दुनिया का संकट बन गया। भारतीय शेयर बाज़ार में सबसे ज्यादा धन अमेरिका से ही आता है। यह अलग बात है कि टैक्स से बचने कि लिए उसका बड़ा हिस्सा मॉरीशस और सिंगापुर में फर्म बनाकर लाया जाता है। देश में जब घरेलू बचतऔरऔर भी