बाज़ार में पक्का कुछ नहीं होता। फिर भी राह निकालने के लिए अपनी तरफ से मशक्कत करनी पड़ती है। रात बीतने ही पिछले भाव अतीत बन जाते हैं। इसके बावजूद ट्रेडर उनके पैटर्न से आगे का अनुमान लगाते हैं। यह अनुमान गणित व सांख्यिकी के मेल से भी निकाला जा सकता है और भावों के चार्ट पर बनती आकृतियों से भी। जिसको जो भाए, उसको उस तरीके से भावी आकलन करना होता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार की अगली चाल कौन-सी चीज़ें तय करती हैं? उसमें जितने भी लोग सक्रिय हैं चाहे वो देशी या विदेशी संस्थाएं हों या एचएनआई निवेशक और भेड़चाल चलते रिटेल निवेशक, इन में सभी की हरेक हरकत का मेल। इसके ऊपर इन लाखों शक्तियों के भिन्न क्रम और मेल का असर। जैसे, लाखों वनस्पतियां जंगल के स्वभाव का निर्धारण करती हैं। फिर भी हम जंगल से पार पाने की जुगत निकालते हैं। अब पकड़ते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

बहुतेरे ट्रेडर अफसोस करते हैं कि उतने भाव पर खरीदा या बेचा होता तो फायदे में रहता। इसी सोच में दिवास्वप्न देखते रहते हैं। भूल जाते हैं कि ट्रेडिंग से कमाई का असली सूत्र सही एंट्री या निकलने के बजाय सौदे का सही आकार है। सौदे का आकार इतना हो कि उसके उल्टा पड़ने की बेचैनी दिन-रात न सताए। एक सौदा ज्यादा से ज्यादा 0.5-1% ट्रेडिंग पूंजी ही डुबाए। बाकी तो प्रायिकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार को पकड़ना किसी के लिए संभव नहीं। अकेले भावों से उसकी थाह लगाना तो एकदम मुमकिन नहीं क्योंकि भाव तो छाया हैं और छाया से काया को नहीं पकड़ा जा सकता। असल में भाव बहुत सारे कारकों से मिलकर बनते हैं। इन कारकों को ध्यान में रखते हुए उनकी भावी चाल का अंदाज़ भर लगाया जा सकता है। यहां पक्का कुछ नहीं, केवल प्रायिकता या संभावना ही निकाली जा सकती है। अब पकड़ें गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में घातक धारणा फैली हुई है कि भाव ही भगवान है। कुछ लोग सारी टेक्निकल एनालिसिस को छोड़कर दावा करते हैं कि केवल भावों के आधार पर बाज़ार को पकड़ा जा सकता है। लोगों को लगता है कि वाह! कितना आसान है। खाली भाव देखना सीख लो तो कमाई ही कमाई होने लगेगी। वे सीखने के चक्कर में दस-बीस हज़ार गंवा देते हैं। लेकिन कमाई में ठन-ठन गोपाल बने रहते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

युद्ध के मैदान में कोई सोचे कि हम ही हम हैं, दूसरा नहीं तो पलक झपकते ही कोई उसे खत्म कर सकता है। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में अक्सर छोटे ही नहीं, बड़े शहरों के सामान्य लोग इसी अहंकार के साथ उतरते हैं। उनको लगता है कि उन्होंने जैसा सोचा है, वैसा ही होगा। पहले छोटा घाटा, उसे निकालने के चक्कर में बड़ा घाटा और फिर खल्लास। आखिरकार, मामू वापस दुकान पर। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

कंपनियों के सालाना नतीजों का मौसम है। अधिकांश लोग मानते हैं कि नतीजे अच्छे होंगे तो शेयर चढ़ेंगे और खराब होंगे तो गिरेंगे। लेकिन अक्सर बाज़ार में ऐसा होता नहीं। खराब नतीजों पर भी कंपनी के शेयर उछल जाते हैं और अच्छे नतीजों पर भी लुढ़क जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि शेयरों के भाव नतीजों या खबरों पर नहीं, बल्कि उन पर ट्रेडर क्या प्रतिक्रिया दिखाते हैं, इससे तय होते हैं। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

निवेश या ट्रेडिंग के लिए कंपनी चुनना बहुत मुश्किल नहीं। रिस्क संभालने की कला सीखना भी कोई खास मुश्किल नहीं। लेकिन इसके लिए हमें अपनी सामान्य सोच व आदतों पर अंकुश लगाना पड़ता है। शेयर बाज़ार में रिस्क संभालने का मोटे तौर पर मतलब है ज्यादा गिरावट से बचना। अगर हम मूविंग औसत व टाइम फ्रेम को ध्यान में रखने लगें और बाज़ार की चलाएं तो अधिक चोट खाने से बच सकते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बचत को अलग-अलग आस्तियों में लगाने को पोर्टफोलियो प्रबंधन भी कहा जाता है। आम लोग ज्यादातर निवेश बैंक एफडी, सोने या रियल एस्टेट में करते हैं। बाकी आस्तियों में निवेश इसलिए नहीं करते क्योंकि वहां मूलधन ही डूबने का रिस्क होता है। लेकिन लंबे समय में सबसे ज्यादा रिटर्न शेयरों में निवेश से मिलता है। ट्रेडिंग में भी हलचल अधिक होने से कमा सकते हैं। मगर, इसके लिए रिस्क संभालना मूल शर्त है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

हकीकत में हमें किसी विशेषज्ञ सलाह या ब्रोकर के एसएमएस की ज़रूरत नहीं होती। मेहनत व अनुशासन की राह पर चलें तो हम अपना निवेश खुद संभाल सकते हैं। यहां तक कि ट्रेडिंग में भी अभ्यास से नियमित कमाई कर सकते हैं। इसके लिए हमें तीन खास बातों का ध्यान रखना होता होता है। ये हैं: बचत को अलग-अलग आस्तियों में सही अनुपात में लगाना, रिस्क संभालना और सही कंपनी का चयन। अब लगाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी