न्यूनतम रिस्क में अधिकतम फायदे की रणनीति कहने में जितनी आसान है, करने में उतनी ही कठिन। इसमें पहली लड़ाई हमें खुद से ही लड़नी पड़ती है। सालों-साल से जो धारणाएं मन में बैठा रखी हैं, उन्हें तोड़ना पड़ता है। यहां तक कि शरीर में सहजता से सक्रिय हो जानेवाले हार्मोन तक से जूझ़ना पड़ता है। एड्रेनलीन हार्मोन हमारे भीतर करो-मरो का भाव जगाता है। लेकिन इससे बचने से ही ट्रेडिंग सधती है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

कोई भी युद्ध अट्ठे-कट्ठे नहीं जीता जाता। इसके लिए सुविचारित रणनीति ज़रूरी होती है। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग भी आज के ज़माने का बड़ा सघन युद्ध है। अगर आपके पास ट्रेडिंग की कोई रणनीति नहीं है तो बेहतर होगा कि आप खुद को लंबे समय के निवेश तक सीमित रखें। लेकिन निवेश व ट्रेडिंग के पीछे समान सोच रखें कि हमें न्यूनतम रिस्क में अधिकतम फायदा कमाना है। कैसे होगा यह हासिल? अब देखें सोम का व्योम…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार सिर्फ खरीद-बिक्री के संतुलन से नहीं, बल्कि मूल आर्थिक स्थिति से भी संचालित होता है। पिछले पांच-छह सालों में क्रूड ऑयल का हाल इसका प्रमाण हैं। जो लोग खाली चार्ट के भरोसे उसकी फ्यूचर ट्रेडिंग कर रहे थे, असली बाज़ार ने उनको कहीं का नहीं छोड़ा। कंपनियों के शेयरों के भाव भी अंततः उनके बिजनेस की मूल स्थिति से प्रभावित होते हैं। इसलिए ट्रेडिंग के लिए फंडामेंटल भी जानना जरूरी है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

आजकल हर चीज़ का लोकतंत्रीकरण हो रहा है। कुछ भी किसी की बपौती नहीं रह गया है। बाबा रामदेव योग को सर्वसुलभ बनाकर आज कितने बड़े नाम बन गए। ट्रेडिंग के लिए सारा डेटा एनएसई व बीएसई की साइट पर उपलब्ध है। यहां तक कि सीधे उनके डेटा के आधार पर तमाम इंडीकेटरों से चार्ट बनाने की सहूलियत भी वहां मुफ्त में उपलब्ध है। डेटा छूटने या करप्ट होने का कोई डर नहीं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

आज ज़माना बिग डेटा का है। हर दिन बाज़ार में जितना ज्यादा डेटा आता है, उसका खाली बुद्धि से विश्लेषण करना तेज़ से तेज़ दिमाग वाले इंसान के लिए भी मुमकिन नहीं। इसलिए हमें मशीन या कंप्यूटर का सहारा लेना ही पड़ेगा। वैसे भी अगर आपके पास कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन नहीं है तो आप गुजरे ज़माने में रह रहे हैं और आपको वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग से दूर रहना चाहिए। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सॉफ्टवेयर पहले जो-जो हुआ है, उसे नियम में बांधकर एक ढर्रा निकाल सकता है। लेकिन ढर्रे में छिपा ट्रेंड नहीं पकड़ सकता है। वहीं, इंसान लगातार अपनी बुद्धि को माजता और दूसरों को हराने की रणनीति को परिष्कृत करता रहता है। इसीलिए सारे इंडीकेटरों के असर को मिलाकर की गई अल्गोरिदम ट्रेडिंग भी अक्सर हकीकत में घाटे का सबब बन जाती है। वैसे भी गर्दन पीछे मोड़कर आगे की राह सही नहीं दिखती। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

इस समय भारत के शेयर बाज़ार में लगभग एक-तिहाई ट्रेडिंग अल्गोरिदम या नियमों से बंधे कंप्यूटर प्रोग्राम से हो रही है। अमेरिका में यह अनुपात 85% से ज्यादा है। भारत में भी आज नहीं तो कल यही हाल होना है। लेकिन क्या मशीन से होनेवाली ट्रेडिंग अंततः इंसान को मात दे सकती है? अगर आपको इसका जवाब ‘हां’ लगता है तो आप गलत हैं क्योंकि मशीन इंसान के स्वभाव को नहीं समझ सकती। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

ट्रेडिंग में भावना या मन के निषेध के लिए पहले हमें अपने मनोविज्ञान को समझना होगा। जैसे, हाथ में आया मुनाफा हम जाने नहीं देना चाहते। मानने को तैयार नहीं होते कि हमारा कोई फैसला घाटा बढ़ाने का सबब बन जाएगा। स्टॉप-लॉस को ऊपर उठाने के बजाय बीच में ही मुनाफा काट लेते हैं। वहीं, उल्टे पड़े सौदे में स्टॉप-लॉस गिराते जाते हैं और घाटे के दलदल में समूची पूंजी डुबा डालते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जिस किसी को शेयर या अन्य वित्तीय बाज़ारों में ट्रेडिंग से कमाना है, उसे ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए, बहुत सारे कारकों के मद्देनज़र ऐसी व्यूह-रचना करनी होगी कि मन लाख कोशिशों के बावजूद उसमें घुस ही न पाए। पक्का समझिए कि मन उसमें घुस गया तो सारा खेल भरभंड कर देगा और आप हार जाएंगे। सिस्टम में क्या नियम रखे जाने हैं, इसके किताबों के साथ ही अपने अनुभव से सीखना होता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

समग्र आकलन जितना वस्तुगत व निरपेक्ष होगा, उतनी ही अधिक उसके सही बैठने की प्रायिकता होती है। यह प्रायिकता 70-80% हो तो क्या कहने! लेकिन प्रायः हम कभी वस्तुगत आकलन कर ही नहीं पाते हैं। इसकी एक वजह तो यह है कि सारे कारकों का पता-ठिकाना हमें मालूम नहीं होता। दूसरे, आकलन में हम आत्मगत पहलू या अपने मन की बात घुसेड़ देते हैं। ऐसे में प्रायिकता में बट्टा लग जाता है। अब आजमाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी