भारत में पिछले सौ सालों में 18 साल सूखे के रहे हैं। इनमें से 13 सालों का वास्ता अन निनो से रहा है। साल 1900 से 1950 के बीच सात साल ही अन निनो आया था। लेकिन साल 1951 से 2021 के दौरान 15 साल अन निनो की गिरफ्त में रहे। इनमें से मानसून के नौ सीजन में औसत से 90% या कम बारिश हुई थी और सूखे के हालात बन गए थे। सबसे ताज़ा सूखा सालऔरऔर भी

अमेरिका के राष्ट्रीय सामुद्रिक व वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए) ने घोषित कर दिया है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर पर अल निनो की तगड़ी पकड़ बन चुकी है। अल निनो एक स्पेनिश शब्द है जिसका मतलब होता है छोटा बच्चा। लेकिन इसके तहत भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुदी सतह का पानी असामान्य रूप से गरम हो जाता है जिससे दुनिया के मौसम पर बड़ा असर पड़ता है। इससे दुनिया के कई इलाकों में अतिवृष्टि और कई इलाकों में सूखेऔरऔर भी

इस बार मौसम का हाल अच्छा नहीं चल रहा। केरल में मानसून का आगाज़ आठ दिन देर से हुआ। मुंबई में समान्य से दो हफ्ते बाद अब जाकर बारिश आई है। समूचे महाराष्ट्र के बारे में मौसम विभाग का कहना है कि अभी तक 88% कम बारिश हुई है। वैसे तो ओडिशा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों तक मानसून पहुंच चुका है। असम में उफनतीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाने का हुनर कोई दूसरा हमें कभी नहीं सिखा सकता। यहां तो मर-खपकर हमें खुद ही एकलव्य बनना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव की कोई कमी नहीं। अलेक्जैंडर एल्डर ने ‘ट्रेडिंग फॉर लिविंग’ पर दो किताबें बेहद ईमानदारी व मेहनत से अपने निजी अनुभव के आधार पर लिखी हैं। इन्हें पढ़कर भारतीय परिस्थिति और अपनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए खुद का ट्रेडिंग सिस्टम विकसित कर सकते हैं। यह काम एक दिनऔरऔर भी

आज फाइनेंस की दुनिया ग्लोबल हो चुकी है। अमेरिका व यूरोप से शुरू होकर धन का प्रवाह ऑस्ट्रेलिया और एशिया के प्रमुख शेयर बाज़ारों से होते हुए भारत तक पहुंचता है। हमारा बाज़ार सुबह 9.15 बजे खुलता है। उसके 40-45 मिनट पहले वैश्विक बाज़ारों का उस दिन का ट्रेन्ड साफ हो चुका है। इसमें भी अगर हम 8.30 बजे सुबह तक सिंगापुर स्टॉक एक्सचेंज की वेबसाइट पर सिंगापुर निफ्टी-50 का हाल देख लें तो अंदाज़ लग जाताऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडर को हमेशा बाज़ार के रुख के साथ चलना चाहिए। बाज़ार का रुख कभी-कभी म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियों जैसे देशी संस्थागत निवेशक (डीआईआई) भी तय करते हैं। लेकिन ज्यादातर उसका फैसला विदेशी पोर्टफोलियो या संस्थागत निवेशक (एफपीआई या एफआईआई) ही करते हैं। डेरिवेटिव बाज़ार तो विदेशी निवेशकों के लिए महज हेजिंग का जरिया है। वे अपनी असली कमाई करते हैं शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से। इसमें अगर उनकी शुद्ध खरीद जारी है और प्रतिदिनऔरऔर भी

अगर आप सोशल मीडिया पर ऑनलाइन या ऑफलाइन स्टॉक ट्रेडिंग सिखानेवालों के फंदे में फंस गए तो बहुत सारे जार्गन या जुमले ज़रूर सीख जाएंगे। लेकिन ट्रेडिंग के सार और अपने रिफ्लेक्सेज़ को कभी नहीं साध पाएंगे। ट्रेडिंग का सार यह है कि सारा खेल भावों के उतार-चढ़ाव का है और शेयरों के भाव धन के आगम और निकास से निर्धारित होते हैं। धन का प्रवाह धनात्मक है, खरीदनेवालों की दिलचस्पी ज्यादा और बेचनेवालों की कम हैऔरऔर भी

आजकल सोशल मीडिया पर शेयर बाज़ार में निवेश व ट्रेडिंग सिखानेवालों की बाढ़-सी आई हुई है। फेसबुक और यूट्यूब पर एक खोजो, दसियों के दीदार हो जाते हैं, वो भी अंग्रेज़ी ही नहीं बल्कि ढेर सारे हिंदी में सिखानेवाले दिख जाते हैं। कोई कुंदन, कोई अवधूत, कोई इन्वेस्टिंग डैडी। सबका दावा कि आपको शेयर बाज़ार का प्रोफेशनल ट्रेडर व स्मार्ट निवेशक बना देंगे। फीस भी हज़ार रुपए के अंदर। शेयर बाज़ार की बुनियादी बातें, अर्थव्यवस्था का इतिहास-भूगोल,औरऔर भी

ऐसा कौन-सा वयस्क होगा जो नहीं जानता कि उसकी वित्तीय ज़रूरतें और सीमाएं क्या हैं? वह नहीं जानता तो यह कि कौन-से स्टॉक्स और म्यूचुअल फंड स्कीम्स में निवेश करे। वह यह भी नहीं जानता कि शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग का रिस्क क्या है और उसे कितना रिस्क लेना चाहिए कि उसकी लुटिया न डूब जाए। समस्या यह कि उसे यह ज्ञान करानेवाला कोई ईमानदार मंच अपने यहां नहीं है। कहने को जो विद्वान, इक्विटीऔरऔर भी

जापान के शेयर बाज़ार में नब्बे के दशक में आंख मूंदकर लम्बा निवेश करनेवाले लोग आज खून के आंसू रो रहे होंगे। वे अगर अपने देश की अर्थव्यवस्था की हालत से वाकिफ रहे होते तो उनकी यह स्थिति नहीं होती। लेकिन शेयर बाज़ार की चकाचौंध और टेक्निकल बातों में उलझे विद्वान कहते हैं कि ब्याज, राजकोषीय हालत, मुद्रास्फीति, कच्चे तेल की कीमत, आयात-निर्यात का संतुलन, क्वांटिटेटिव ईजिंग या नोट छापकर सिस्टम में डालने जैसी तमाम जानकारियां वऔरऔर भी