शेयर बाज़ार समेत वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग का अपना नियम-धर्म है। यह हमारी मान्यताओं व सोच से अलग है। ट्रेडिंग के दौरान हम अपनी सोच व मान्यताओं को एक तरफ रख दें और बाज़ार के वास्तविक पैटर्न व संतुलन को समझकर काम करें, तभी सफल हो सकते हैं। अन्यथा, बराबर विफल होने को अभिशप्त हैं। कम से कम हमें अपनी सोच के उन तत्वों को हटाना होगा जो नकारात्मक भावनाओं को उकसाते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कोई कहे कि शेयर-ट्रेडिंग के दौरान बेहतर होगा कि सोचना बंद कर दें तो आप कहेंगे कि क्या बकवास है! सोचना तो ट्रेडिंग की समूची प्रक्रिया में चलता ही रहता है, उसे कैसे रोक सकते हैं! सही बात कि आप क्या और कैसे सोचते हैं, इससे आपकी ट्रेडिंग शुरू से अंत तक प्रभावित होती है। फिर भी इस सोचने पर बराबर नज़र रखनी चाहिए और उसे जितना संभव हो, उतना घटा देना चाहिए। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

स्टॉप-लॉस ट्रेडिंग के बिजनेस का अभिन्न हिस्सा है। इसको इस बिजनेस की लागत भी कहा जाता है। बड़े से बड़ा कामयाब ट्रेडर भी इससे बच नहीं पाता। लेकिन हम उसे स्वीकार नहीं कर पाते क्योंकि हमारे मन में गहरे बैठा है कि हमें कभी नाकाम नहीं होना, घाटा नहीं खाना है। इस विचार या मान्यता के चलते हम स्टॉप-लॉस की वास्तविकता को मनोवैज्ञानिक रूप से पचा नहीं पाते और तनाग्रस्त हो जाते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

हमारे विचारों, भावनाओं और बर्ताव से तय होता है कि हम ट्रेडिंग या दूसरी गतिविधि से क्या परिणाम हासिल करते हैं। विचार बनते हैं हमारी मान्यताओं, पूर्वाग्रहों, मूल्यों, दृष्टिकोण व रुझान से। जब भी किसी घटना पर हमारा ध्यान जाता है तो विचार सक्रिय हो जाते हैं और हमारा दिमाग फटाफट न्यूरोन्स दागना शुरू कर देता है। मसलन, स्टॉप-लॉस की नौबत आ जाए तो हम इस तरह घाटा खाना स्वीकार नहीं कर पाते। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

लालच व डर, यही दो भावनाएं हैं जिन पर शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग का सारा खेल चलता है। लेकिन ये भावनाएं हमारे अंदर आखिर काम कैसे करती हैं? एड्रेनल ग्लैंड की चर्चा हम पहले भी कर चुके हैं। यह हमारे मस्तिष्क में भावनाओं के स्रोत लिम्बिक सिस्टम में शामिल है। वहां इसके अलावा हिप्पोकैम्पस, हाइपोथैलमस, पिट्यूटरी व अमिगडाला जैसे अंग हैं। यही हमारे भीतर डर, चिंता व संदेह जैसे भाव पैदा करते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

भावनाएं जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। वे स्वस्थ जीवन के लिए निहायत ज़रूरी हैं। लेकिन उन्हें अगर पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो वे हमें बरबाद कर सकती हैं। जीवन के दूसरे क्षेत्रों की तरह यह बात वित्तीय बाजार की ट्रेडिंग पर भी लागू होती है। ट्रेडिंग में सफलता की राह खोलने के लिए हमें अपने पूर्वाग्रहों के साथ-साथ उस झोंक को भी समझना होता है जिसमें आकर हम फैसले करते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

राजनीति में वोट पाने के लिए डर और लालच की भावना का इस्तेमाल किया जाता है। शेयर बाज़ार में भी इन्हीं दो भावनाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इन भावनाओं का स्रोत है शरीर में पैक्रियाज़ के नीचे की एड्रेनल ग्रंथि, जिससे एड्रेनील हार्मोन निकलता है। यह हमारे अंदर ‘लड़ो या भागो’ की भावना भर देता है। सुरक्षा से जुड़े राष्ट्रवाद और शेयर बाज़ार में तेज़ी-मंदी के पीछे यही हार्मोन काम करता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

मतगणना जारी है। शाम होते-होते साफ हो जाएगा कि भावनाओं के उबाल और तिकड़मबाज़ी की जीत हुई है या देश के व्यापक अवाम ने अपने वास्तविक हितों को ध्यान में रखते हुए वोट दिया है। स्पष्ट हो जाएगा कि देश के अगले पांच साल का फैसला दिल से लिया गया है या बुद्धि से। बुद्धि से फैसला नहीं हुआ तो राजनीतिक गठबंधन की जीत के बावजूद देश हार जाएगा। यकीनन, यह दुभार्ग्यपूर्ण होगा। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

सारा देश दिल थामकर 17वीं लोकसभा के चुनाव नतीजों का इंतज़ार कर रहा है। लेकिन थोड़ा ठहरकर सोचिए कि अगर पुलवामा व बालाकोट नहीं हुआ होता, तब भी क्या मोदी सरकार अपने काम के दम पर लोगों को इस तरह खींच पाती? यह है तो काल्पनिक सवाल, लेकिन प्रासंगिक इसलिए है क्योंकि भावनाओं के उबाल पर ली गई कोई प्रतिक्रिया जनमत का असली प्रतिनिधित्व नहीं करती। सवाल देश के पांच साल का है! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार विशुद्ध धंधा है। वहां बुद्धि की तलवार लेकर भावनाओं से खेलना स्वाभाविक है। मगर, राजनीति पहले धंधा नहीं, सेवा हुआ करती थी। उसे अब भी ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन आज का कड़वा सच है कि धर्म की तरह राजनीति भी सबसे कम समय में सबसे ज्यादा कमाने का धंधा बन गई है। इसमें सच नहीं, महज झांकी पेश की जाती है। विज्ञापनों के शोर में सच गायब हो जाता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी