एक तो मानव मस्तिस्क की संरचना, ऊपर से वर्तमान के खांचे में कसी सोच की धृतराष्ट्री जकड़। सो, वर्तमान की सार्थक आलोचना और भविष्य की तार्किक दृष्टि तक हम पहुंच ही नहीं पाते और आगे बढ़ने की कोशिश में हमेशा मुंह की खाते रहते हैं।और भीऔर भी

किसी इंसान की बातों से तय नहीं होता कि वे दमदार हैं या कोरी बकवास। इसी तरह किसी राजनीतिक दल के घोषणापत्र या नारों से नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक संरचना से तय होता है कि वह सचमुच अपने कहे पर अमल कर पाएगी या नहीं।और भीऔर भी

जटिलता से क्या भागना! सरलता की मंजिल तो जटिलता से गुजरकर ही मिलती है। आंतरिक संरचनाएं जितनी जटिल होती जाती हैं, चीजें उतनी आसान हो जाती हैं। खुद-ब-खुद आसानी से खुलनेवाला कांच का दरवाजा अंदर से जटिल होता है।और भीऔर भी