देश के जीडीपी में 30.1% योगदान वाले एमएसएमई क्षेत्र की हालत साल-दर-साल खराब होती जा रही है। लेकिन सरकार का जुबानी जमाखर्च बदस्तूर जारी है। इस बार बजट के पहले कर्तव्य में चैम्पियन एमएसएमई बनाने का वादा है। इससे पहले 2025-26 के बजट में कृषि के बाद इसे विकास का दूसरा इंजिन बताया गया। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि 2024-25 में इसका बजट आवंटन ₹22,137.95 करोड़ था, संशोधित अनुमान ₹17,306.70 करोड़ का था और वास्तविक खर्चऔरऔर भी

ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिशराज में भारत से कच्चा माल लूटकर बाहर ले जाया गया और अंतिम उत्पाद बनाकर दुनिया भर के बाज़ारों में बेचा गया। इसमें सुगमता के लिए उन्होंने भारत में बंदरगाह व सड़कें बनाई और रेल नेटवर्क तैयार किया। उनकी इस अनीति से भारत के लाखों छोटे उद्योग-धंधे और कारीगर तबाह हो गए। मोदी सरकार भी कमोबेश यही कर रही है। अंतर बस इतना है कि वो विदेशी कंपनियों को भारत में कच्चा मालऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया भर के डेटा को भारत आने का न्यौता दे दिया। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट मे विदेशी कंपनियों को भारत में डेटा सेंटर बनाने पर अगले बीस साल तक टैक्स से मुक्ति दे दी। अब अमेरिकी कंपनी एएमडी ने भारत में 200 मेगावॉट क्षमता का एआई डेटा सेंटर बनाने का इरादा घोषित कर दिया। इसमें उसने टीसीएस को जूनियर पार्टनर बनाया है। इस तरह मोदी प्रसन्न और सीतारमण का रमण-चक्र पूरा। लेकिनऔरऔर भी

मेक इन इंडिया का कार्यक्रम चलाया तो विदेशी कंपनियों से खुलकर कहा कि भारत में आकर बनाओ और दुनिया भर में बेचो। लेकिन 11 साल से ज्यादा वक्त बीतने के बाद स्थिति यह है कि देश में जितना विदेशी पूंजी निवेश आ रहा है, उससे ज्यादा स्वदेशी निवेश बाहर जा रहा है। स्वदेशी मैन्यूफैक्चरिंग का भट्ठा बैठ गया, जबकि उद्योग-धंधों में चीनी घुसपैठ बढ़ गई। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में एआई का विशाल वैश्विक सम्मेलन करऔरऔर भी

बेहद आश्चर्य की बात है कि देश के जिस मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की हालत पस्त है, भाजपा-नीत एनडीए के बारह सालों के शासन में जिसे बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद अपने हाल पर छोड़ दिया गया, उसने राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने के लिए बने चुनावी ट्रस्टों को सबसे ज्यादा धन दिया है और इन ट्रस्टों ने सबसे ज्यादा चंदा भाजपा को दिया है। यह तथ्य एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के ताज़ा अध्ययन से उजागर हुआ है। आखिर इसऔरऔर भी

राष्ट्रवाद एक ऐसी पवित्र भावना व धारणा है जिसमें देश की अस्मिता, संप्रभुता, भूभाग, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए सब कुछ बलिदान कर दिया जाता है। फिर खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बतानेवाली भाजपा, उसके सबसे ताकतवर व यशस्वी कहे जाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का यह कर्म कैसे व क्यों कि जब चीन गलवान घाटी में घुसपैठ कर भारत की हज़ारों किलोमीटर ज़मीन कब्जा कर लेता है तो मोदी बयानऔरऔर भी

अमेरिका की शर्तों पर व्यापार संधि करने की यह कैसी मजबूरी है कि खुद को राष्ट्रवादी बताने वाली मोदी सरकार देश के कानूनों को भी धता बताने में जुट गई है। वो पिछली गली से अमेरिका की जीएम फसलों को गुपचुप भारत में घुसा रही है। भारत में बीटी कॉटन के अलावा कोई भी जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) फसल आयात नहीं की जा सकती है। अमेरिका में भुट्टे व मक्के से लेकर सोयाबीन तक प्रमुख जीएम फसलें हैंऔरऔर भी

मोदी सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बाद झूठ व स्वांग के तीसरे सरदार हैं कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान। अमेरिका-भारत व्यापार पर अंतरिम सहमति से पहले फ्रेमवर्क की एकतरफा घोषणा के बाद ही चौहान ने कह डाला, “कृषि मंत्री के तौर पर मैं गर्व से कह सकता हूं कि हमारे किसानों के हितों की पूरी तरह सुरक्षित हैं। किसानों के हितों की पूरी सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री का धन्यवाद। उनके नेतृत्वऔरऔर भी

इतिहास गवाह है कि दुनिया का कोई भी देश मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाए बिना समृद्ध नहीं बन सका है। चाहे वो अमेरिका हो, जापान हो, दक्षिण कोरिया हो या चीन। भारत इसका अपवाद नहीं हो सकता। लेकिन मोदी सरकार मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाने के लिए केवल जुबानी जमाखर्च कर रही है। देश के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का योगदान बारह सालों से 15-16% पर अटका हुआ है। पहले यूरोपीय संघ के साथ हुई संधि को वाणिज्य मंत्रीऔरऔर भी

देश के सीने पर बारह साल से चढ़कर बैठी मोदी सरकार में हांकने वालों की कोई कमी नहीं। वैसे, लम्बी फेंकने व हांकने में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई सानी नहीं। लेकिन उनको किनारे रख दें, तब भी इनके मंत्री परिषद में एक से एक नमूने भरे पड़े हैं। वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ऐसे ही एक नगीना हैं। उनका दावा है कि यूरोपीय संघ के साथ की गई व्यापार संधि व्यापार ही नहीं, भारतऔरऔर भी