तंत्र औपनिवेशिक किस्म का हो तो सत्ता से बाहर के सारे लोग या तो दलाल होते हैं या दलित। दलित कोई जाति नहीं। सवर्ण, अवर्ण कुछ नहीं। विकास के अवसरों से जो भी वंचित हैं, वे सभी दलित हैं।और भीऔर भी

जाति-आधारित राजनीतिक दलों के दबाव में देश में अब वह काम होने जा रहा है जिसे 1947 में आजादी के बाद ही सायास छोड़ दिया गया था। कैबिनेट ने गुरुवार को जाति-आधारित जनगणना को मंजूरी दे दी। यह जनगणना अगली साल फरवरी से मार्च तक सामान्य जनगणना के खत्म होने के बाद जून से शुरू की जाएगी और इसे सितंबर तक खत्म कर लिया जाएगा। इससे पहले देश में आखिरी जाति-आधारित जनगणना अंग्रेजों के शासन में 1931औरऔर भी