अगर आप अपने से खुश हैं तो दुनिया भी आपकी परवाह करेगी। लेकिन अगर आप खुद अपने से ही दुखी हैं तो भगवान भी आपको नहीं बचा सकता। इसलिए अपनी कमियों व खूबियों का सही अहसास जरूरी है। न तो आत्ममुग्धता और न ही आत्मदया।और भीऔर भी

अपना हाल हम ही जानते हैं या मानते हैं कि भगवान जानता है। दूसरों का हाल हम पूछते नहीं, न ही उसकी परवाह करते हैं। लेकिन चाहते हैं कि दूसरा हमारी परवाह करे। नहीं करता तो उसे निपट स्वार्थी बताते हैं। पर, अपनी तरफ देखने की जहमत नहीं उठाते।और भीऔर भी

शरीर की स्वतंत्र चाल है। मन भी स्वतंत्र और उच्छृंखल है। लेकिन दोनों एक दूसरे से स्वतंत्र नहीं। दोनों अभिन्न हैं। एक की चाल दूसरे को प्रभावित करती है। इसलिए अगर एक को ठीक रखना है तो दूसरे का भी उतना ही ख्याल रखना जरूरी है।और भीऔर भी