भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना किसी आर्थिक योजना का नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं को भुनाने का एक राजनीतिक छलावा है, जुमला है। हम इसे हासिल भी कर लें तो प्रति व्यक्ति 3472 डॉलर सालाना की मध्यम आय वाला देश ही बने रहेंगे। रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके ख्यात अर्थशास्त्री सी. रंगराजन का कहना है कि विकसित व उच्च-मध्यम आय वाला देश बनने के लिए हमारी प्रति व्यक्ति आय कम से कम 13,205औरऔर भी

बीते साल 1 दिसंबर 2022 तो जब से निफ्टी 18,885 अंक के ऊपर गया, तभी से हल्ला था कि वो कभी भी 20,000 अंक के पार जा सकता है। लेकिन चार महीने बीतते-बीतते भी ऐसा होने के कोई आसार नहीं दिख रहे। जिन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लाए धन पर शेयर बाज़ार चढ़ा था, वे खरीदने के बजाय बराबर बेचे जा रहे हैं। इसलिए हमारे बाज़ार की हवा निकली पड़ी। कारण यह भी है कि छोटे समयऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की चाल कभी इतनी सीधी-सच्ची नहीं होती कि उस पर आंख मूंदकर सवारी की जा सके। अजीब-सा पेंच है कि अक्सर अच्छे नतीजे घोषित करनेवाली कंपनियों के शेयर गिर जाते हैं, जबकि खराब नतीजे पेश करनेवाली कंपनियों के शेयर चढ़ जाते हैं। दिक्कत यह है कि हम भूल जाते हैं कि शेयरों के भाव और मूल्य, दो अलग-अलग चीजें हैं। लम्बे समय में भाव कंपनी के शेयर के मूल्य या अंतर्निहित मूल्य का पीछा करतेऔरऔर भी

भारत संभावनाओं से भरा देश है। इसमें कोई दोराय हो ही नहीं सकती। यहां कमानेवाले लोग अगले करीब पचास साल तक रिटायर्ड लोगों से कहीं ज्यादा रहेंगे। एक अनुमान के मुताबिक भारत की आबादी का मध्यमान साल 2070 तक 29 साल रहेगा। साफ है कि सरकार शिक्षा व स्वास्थ्य की कितनी भी उपेक्षा कर ले, हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड फिलहाल अक्षुण्ण है। गंगा की वेगवती धारा अपनी राह निकाल ही लेती है। भारत के नौजवान रोज़ी-रोजगार के साधनऔरऔर भी

अभी देश में स्टार्ट-अप्स की क्या स्थिति है? संसद में दी गई ताज़ा जानकारी के मुताबिक वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय ने कुल 92,683 स्टार्ट-अप्स को मान्यता दे रखी है। ये उद्यम जनवरी 2016 में सरकार द्वारा शुरू की गई स्टार्ट-अप इंडिया पहल के तहत टैक्स व गैर-टैक्स लाभ पा सकते हैं। सरकार ने खुद की पीठ थपथपाते हुए कहा कि देश में जहां 2016 में मात्र 442 स्टार्ट-अप थे, वहीं 28 फरवरी 2023 तक इनकी संख्या 92,683औरऔर भी

स्टार्ट-अप को लगी मार का सबसे तगड़ा असर शिक्षा टेक्नोलॉज़ी (एजुटेक) क्षेत्र के उद्यमों पर हुआ। इस क्षेत्र को साल 2021 में 4.1 अरब डॉलर की फंडिंग मिली थी। यह साल 2022 में घटकर 2.4 अरब डॉलर पर आ गई। असर यह हुआ कि 25 फंडेड एजुटेक स्टार्ट-अप बंद हो गए। इन बंद होनेवाले उद्यमों में लिडो लर्निंग, उदय्य, सुपरलर्न व क्रेजो.फन शामिल हैं। लिडो लर्निंग ने 2 करोड़ डॉलर की फंडिंग जुटाई थी। उसके बंद होनेऔरऔर भी

स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया का नारा सुनने में सबको बहुत अच्छा लगा था। लेकिन जब इन नए उद्यमों में बाज़ार की शक्तियों के बजाय सरकारी आश्रय का खेल चलने लगा तो बहुतेरे स्टार्ट-अप्स के शटर गिरने लगे। पिछले पांच सालों में सबसे ज्यादा 3484 स्टार्ट-अप साल 2018 में बंद हुए। साल 2021 में एक बार फिर इन उद्यमों में उत्साह दिखा। उस दौरान बंद होनेवाले स्टार्ट-अप्स की संख्या घटकर 1012 पर आ गई। लेकिन अगले ही सालऔरऔर भी

अमेरिका में सिलिकॉन वैली बैंक (एसवीबी) के बंद होने से उपजे संकट से भारत के सैकड़ों स्टार्ट-अप उद्यमी बाल-बाल बच गए। एसवीबी में मनी ट्रांसफर की स्विफ्ट सुविधा न होने के बावजूद उन्होंने अपनी जमापूंजी अमेरिका के दूसरे बैंकों में ट्रांसफर कर दी। साथ ही उन्हें भारत सरकार, रिजर्व बैंक और गिफ्टी सिटी के अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नेटवर्क से भी मदद मिली। लेकिन कुल मिलाकर भारत में स्टार्ट-अप्स की मौजूदा स्थिति क्या है? इसे हमें भारतीय अर्थव्यवस्था कीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार हो या वित्तीय बाज़ार का कोई भी निवेश, वो किसी निर्वात में नहीं होता। हर निवेश का एक संदर्भ और माहौल होता है। इधर साल भर पहले मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए अमेरिका से ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला जब से शुरू हुआ, तब से सारी दुनिया के वित्तीय समीकरण बदल गए हैं। अमेरिका में तो ब्याज दरों के शून्य से 5% पहुंचने का ही नतीजा है कि बैंकों के सारे बॉन्ड पोर्टफोलियो कीऔरऔर भी

अमेरिका के सिलिकॉन वैली बैंक (एसवीबी) का संकट अभी तक पूरी तरह मिटा नहीं है। वैसे, वहां के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने अलग से 25 अरब डॉलर का बैंक टर्म फंडिंग प्रोग्राम (बीटीएफपी) बना दिया है। हर संकट से निपटने की पूरी तैयारी है। लेकिन बीते शुक्रवार को बैंक बंद हुआ तो भारतीय स्टार्ट-अप उद्यमों में अफरातफरी मच गई। कारण, चूंकि एसवीबी इन्हें बिना किसी अमेरिकी सोशल सिक्यूरिटी नंबर या इनकम टैक्स आइडेंटीफिकेशन नंबर के खातेऔरऔर भी