पैसा बड़े-बड़ों को हिलाकर रख देता है। 50% डिस्काउंट मिले तो हम दोगुनी खरीदारी कर डालते हैं। साथ में कुछ मुफ्त ऑफर हो तो महंगी चीज़ तक खरीद डालते हैं। पैसा हमें भावनाओं की ऐसी भंवर में उलझा देता है जहां हम तर्कसंगत फैसले नहीं कर पाते, जबकि ट्रेडिंग तर्कसंगत व्यवहार की मांग करती है। पैसे पर फोकस रहेगा तो ट्रेडिंग में फिसल जाएंगे। कुशल ट्रेडिंग पर ध्यान रहेगा तो पैसा अपने-आप आएगा। अब आज की ट्रेडिंग…औरऔर भी

भाव बढ़ते और गिरते हैं। लंबे निवेश के लिए इसका खास मतलब नहीं। मायने-मतलब है तो मूल्य का। भाव के लिए चुकाए गए धन के एवज में हमें मिलता है मूल्य। भाव हमें दिखता है। मूल्य दिखता नहीं, लेकिन हमारे निवेश की सार्थकता का सार है। भाव शरीर है तो मूल्य चरित्र है, आत्मा है। हम ऐसे ही मूल्यवान शेयरों को बराबर यहां पेश करते रहे हैं। मसलन, अतुल लिमिटेड तीन साल में तीन गुना हो गया…औरऔर भी

ट्रेडिंग से कमाई के लिए हमेशा सही होना ज़रूरी नहीं। सच तो यह है कि बाज़ार आपको ज्यादातर हराएगा। इसमें कोई हेठी नहीं, बल्कि सीख मिलती है कि अतिविश्वास कितना घातक हो सकता है। असली सूत्र है कि जब कभी बाज़ार आपको गलत साबित करे, आप पतली गली से निकल लें। इसका सबसे कारगर ज़रिया है स्टॉप लॉस। जो चक्रव्यूह में घुसकर निकलना नहीं जानते, उनका हश्र अभिमन्यु जैसा ही होता है। देखें अब आज का हाल…औरऔर भी

यूं तो ज्यादातर ट्रेडर हाई ब्लड-प्रेशर के शिकार होते है। लेकिन उत्तेजना में जीनेवाले ट्रेडर ज्यादा टिकते नहीं। लाभ-हानि दोनों ही अवस्था में जो शांत रहते हैं, वही टिकते हैं। सौदे में बड़ी कमाई से चहकनेवाले ट्रेडर उस वकील जैसे हैं जो मुकदमे के बीच ही नोट गिनने लगता है। वहीं घाटा खाकर लस्त पड़नेवाले ट्रेडर उस सर्जन जैसे हैं जो ऑपरेशन टेबल पर मरीज का खून देखकर बेहोश हो जाता है। अब बाज़ार पर शांत नज़र…औरऔर भी

शेयर का भाव ठीक उस वक्त खरीदारों और विक्रेताओं के बीच स्वीकृत मूल्य को दर्शाता है। तेजड़िया इस उम्मीद में खरीदता है कि भाव आगे बढ़ेगा। मंदड़िया इस भरोसे में बेचता है कि भाव गिरेगा। ये चारों तरफ से ऐसे निवेशकों/ट्रेडरों से घिरे रहते हैं जो दुविधाग्रस्त हैं। दुविधा छोड़ ऐसे लोग बाज़ी न मार ले जाएं, यह डर तेजड़ियों और मंदड़ियों से सौदा करवाता है और निकलता है भाव। उतरें अब भावों की ताज़ा भंवर में…औरऔर भी

शेयरों के भाव विशेषज्ञ, विश्लेषक या सलाहकार नहीं, बल्कि भीड़ तय करती है। लेकिन जब भीड़ में शामिल अधिकांश लोगों पर तेज़ी का सुरूर चढ़ जाए तो इस तेज़ी को आगे बढ़ाने के लिए खरीदार घट जाते हैं। गिरावट शुरू हो जाती है। तब हर कोई बेचने लगता है। इसकी अति पर चक्र फिर वापस मुड़ जाता है। समझदार ट्रेडर भीड़ के साथ चलने के साथ-साथ इन अतियों का बराबर शिकार करते हैं। अब आज का बाज़ार…औरऔर भी

वजहें और भी हैं पिछले कुछ सालों में शेयर बाज़ार से हमारी दूरियां बढ़ने की। पर खास वजह है मल्टीबैगर के नाम पर केवल और केवल स्मॉलकैप और मिडकैप स्टॉक्स का लालच फेंकना। न जाने कितने निवेशकों का धन ऐसी कंपनियों में आधे या एक तिहाई से भी नीचे आ चुका है। तथास्तु देश की एकमात्र ऐसी संतुलित और भरोसेमंद सेवा है जो आपके लालच को नहीं, भविष्य को संवारती है। लंबे निवेश का एक और मौका…औरऔर भी

ट्रेडिंग कोई सीधा-सरल सहज नहीं, बल्कि जटिल खेल है। अनिश्चितता की भंवर में आपको फैसला करना होता है। फैसला इस आधार पर कि पल-पल बदलते भावों का पैटर्न क्या है? यह समझ कि भीड़ का झुकाव ठीक इस वक्त किधर है? तेजी और मंदी के खेमे में किसका पलड़ा भारी है? पूंजी बड़ी हो तो खरीदने-बेचने के सौदे साथ कर सकते हैं। लेकिन कम पूंजी में ऐसा मुमकिन नहीं। चलिए करें इस जटिलता को सुलझाने का अभ्यास…औरऔर भी

आप भीड़ का हिस्सा बने रहे, उसी तरह सोचते रहे तो हमेशा वोटर और उपभोक्ता ही बने रहेंगे, नेता-विजेता कभी नहीं बनेंगे। कंपनियां और राजनीतिक पार्टियां आपकी सोच पर अपना साम्राज्य खड़ा करती रहेंगी। आपको अपना बिजनेस खड़ा करना है तो भीड़ की सोच से ऊपर उठना पड़ेगा, भीड़ की सोच से खेलना पड़ेगा। जो ट्रेडर इस खेल में पारंगत हो जाता है, वो ऐश करता है। बाकी आते हैं, क्रैश कर जाते हैं। अब चलें आगे…औरऔर भी