अगर आप किसी चीज़ को सरल रखें, तामझाम व झांकी न जोड़ें तो लोग उसे नहीं खरीदते। बेचने के लिए पैकेजिंग बड़ी जानदार होनी चाहिए। लेकिन धन बनाने का फंडा बड़ा सीधा होना चाहिए। ट्रेडिंग में यह बात पूरी तरह लागू होती है। जो लोग टेक्निकल एनालिसिस के तमाम इंडीकेटरों से लेकर फंडामेंटल व फिबोनाच्ची नंबरों का सहारा लेते हैं, वे प्रायः घाटा खाते हैं। वहीं सरलता आपको सफलता तक ले जाती है। अब मंगल की नब्ज़…औरऔर भी

बजट अच्छा है या बुरा, इस पर माथापच्ची करना विश्लेषकों व कंपनियों के रणनीतिकारों का काम है। ट्रेडर का काम तो जो और जैसा है, उसमें कमाने की जुगत निकालने का है, बजट की लहर पर सवारी गांठने का है। बजट से बाज़ार उठता है तो बढ़नेवाले शेयरों के साथ कमाना है। सीमित दायरे में रहे तो रिट्रेसमेंट या इम्पल्स से कमाएंगे। नीचे गिरे तो स्टॉक्स के सपोर्ट स्तर से कमाएंगे। अब बजट-बाद की ट्रेडिंग का आगाज़…औरऔर भी

शेयरों के भाव कभी न कभी अपने अंतर्निहित मूल्य तक पहुंचते ही हैं। चढ़ा हुआ स्टॉक नीचे उतरता है और गिरा हुआ स्टॉक ऊपर भी उठता है। फिर, निवेश करते वक्त सुरक्षित मार्जिन भी लेकर चलना होता है। अगर किसी स्टॉक में ऐसा मार्जिन न दिखे तो फिलहाल उसमें निवेश नहीं करना चाहिए और हमें उसके गिरने की बाट जोहनी चाहिए। नहीं गिरे तो उसका मोह छोड़ देना ही श्रेयस्कर है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

ट्रेडिंग का आसान सूत्र है कि आप सामनेवाले से थोड़ा-सा भी बेहतर हुए तो जीतेंगे। बेहतरी तीन चीजों से बनती हैं – सूचनाएं, विश्लेषण व भावनात्मक बर्ताव। पहली दो चीजें आपको बाहर से मिल सकती हैं, जबकि तीसरी व निर्णायक चीज़ के मालिक आप हैं। आप कहेंगे कि भावना तो हर इंसान में होती है, उससे कैसे बचा जा सकता है! सही बात है। इसीलिए पोजिशन साइज़िंग व स्टॉप-लॉस का अनुशासन है। अब छलांग बजट के बवंडरऔरऔर भी

प्रभु का रेल बजट देश व भारतीय रेल की अर्थव्यवस्था के लिए कितना अच्छा है या बुरा, यह तो बाद में पता चलेगा। लेकिन इतना तो साफ है कि रेल से जुड़ी तमाम कंपनियों – टीटागढ़ वैगन्स, टेक्समैको रेल, केरनेक्स माइक्रो, कंटेंनर कॉरपोरेशन, स्टोन इंडिया व कालिंदी रेल के शेयर और ज्यादा गिर गए। इसीलिए नियम है कि कोई लाख कहे, जिन दिन खबर हो, उस दिन कतई ट्रेड नहीं करना चाहिए। अब करते हैं शुक्रवार काऔरऔर भी

चलनेवाले मॉल में रोज़ाना हज़ारों चीज़ें बिकती है और रोज़ वहां हज़ारों लोग जाते हैं। लेकिन आप न तो वहां हर चीज़ खरीदते और न ही रोज़ाना जाते हो। इसी तरह हर दिन और हर स्टॉक में ट्रेडिंग कतई ज़रूरी नहीं। कुछ सफल ट्रेडर साल में पांच-दस स्टॉक में दस-बीस दिन की ट्रेडिंग से जमकर कमाते हैं। प्रत्येक स्टॉक का अलग स्वभाव होता है और हमें माफिक स्टॉक्स छांटकर उनमें ट्रेड करना चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में सबसे बड़ी आस्ति हैं आप और आपका माइंटसेट। टेक्निकल एनालिसिस, ट्रेडिंग की सलाह, सूचनाओं व ज्ञान का नंबर बाद में आता है। आप इसलिए क्योंकि स्टॉप लॉस या किसी अन्य वजह से हिल गए हैं तो आप सही व संतुलित फैसला ले ही नहीं पाएंगे। माइंडसेट इसलिए क्योंकि आपको भीड़ से उल्टा सोचने की आदत डालनी है। औरों से पहले खरीदें और औरों से पहले बेचें। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार में सभी पैसा बनाने के लिए आते हैं। मगर कड़वी हकीकत यह है कि यहां 95% लोग पैसा गंवाते हैं और केवल 5% कमाते हैं। इसका कारण सूचनाओं या पूंजी का अभाव नहीं। दरअसल, ट्रेडिंग में भावों की सूचना सबसे अहम है जो छोटे-बड़े सभी को उपलब्ध है। हरेक सौदे में जीतना संभव नहीं। लेकिन हम ‘गंवाएं तो पैसा, कमाएं तो रुपया’ का अनुशासन अपनाएं तो बराबर फायदे में रहेंगे। अब पकड़ते हैं मंगलवार की आहट…औरऔर भी

सरकार ने चाहा। मगर, बहाना है कि ब्रोकरों के संगठन, एसोसिएशन ऑफ नेशनल स्टॉक एक्सचेंजेज़ मेम्बर्स ऑफ इंडिया ने मांग की थी कि बजट के दिन शनिवार को बाज़ार खोला जाए ताकि उसी दिन मूल्यों की खोज़ सही हो जाए। असली बात यह है कि सरकार बजट पर फौरन बाज़ार की तालियां चाहती है। सेबी ने सरकार का इशारा समझते हुए बजट के दिन बाज़ार खोलने का फरमान जारी कर दिया। अब करते हैं हफ्ते का आगाज़…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में भरोसे का भयंकर अकाल है। तमाम ब्रोकरेज़ हाउस व एनालिस्ट घनेरों सलाह देते हैं। लेकिन, वे जो कहते हैं, खुद उसका उल्टा करते हैं। उनका मकसद किसी तरह निवेशकों का शिकार करना होता है। निवेशकों की हालत यह है कि दूध का जला, छाछ भी फूंककर पीता है। ऐसे में निष्पक्ष व ईमानदार सलाह का पता लगते ही लोग उसके दीवाने हो सकते हैं। मगर, उन्हें पता तो लगे! तथास्तु में नई संभावनामय कंपनी…औरऔर भी