कितने भी रिटेल ट्रेडरों से मिल लीजिए, कुछ महीने या साल भर सभी बम-बम करते मिल जाएंगे। लेकिन फिर ऐसा विलाप करते हैं कि मत पूछिए। घाटे में किसी की भी हालत ऐसी हो जाती है। वे कभी शांति से नहीं सोचते कि उनकी ऐसी दुर्दशा क्यों हुई। बजाय इसके वे दोबारा रातोंरात अमीर बनने के किसी धंधे को आजमाने निकल पड़ते हैं। ध्यान रखें कि प्रायिकता के खेल में निश्चितता नहीं होती। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

जिस वित्तीय बाज़ार में भाव एकाध नहीं, अनेकानेक कारणों से प्रभावित होते हैं, जहां भाव मुठ्ठीभर नहीं, बल्कि लाखों लोगों में बसी लालच व डर की भावना से तय होते हों, वहां भविष्य के भावों की गणना यकीनन हम-आप कर सकते हैं, लेकिन हमेशा उनका सटीक निकलना संभव नहीं। कुछ सौदे उल्टे पड़ सकते हैं। हम अधिक से अधिक इतना कर सकते हैं कि सौदे उल्टे पड़ें तो मार कम से कम लगे। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

मानसून की पहली बारिश ने माहौल में थोड़ी ठंडक घोल दी। लेकिन समग्र मानसून को लेकर चिंता बरकरार है। अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर भी पहले जैसा आशावाद नहीं बचा। विदेशी निवेशकों ने मई में पिछले 21 महीनों में पहली बार शेयर बाज़ार में शुद्ध बिकवाली की। ऐसे में हो सकता कि बाज़ार महीनों तक सीमित रेंज में बंधकर रह जाए। जाहिर है कि इस दौर में ट्रेडिंग की रणनीति अलग होनी चाहिए। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

उपभोक्ता की तेल, साबुन व पेस्ट जैसी रोजमर्रा की ज़रूरतें हमेशा बनी रहनी हैं तो एफएमसीजी कंपनियों का धंधा कभी मंदा नहीं पड़ता। गरीब से गरीब इंसान भी दवाओं व इलाज पर खर्च में कोताही नहीं बरतता तो दवा कंपनियों का धंधा भी सदाबहार चलता है। इसी तरह उन कंपनियों का धंधा भी बराबर चौकस रहता है जो आम उपभोक्ता को नहीं, बल्कि उद्योगों को सीधे अपना माल बेचती हैं। तथास्तु में आज ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

ब्रोकरों के धंधे का मुख्य आधार हमारे निवेश या ट्रेडिंग से मिले ब्रोकरेज़ से कमाई करना है। वे अगर मुफ्त सलाह देते हैं तो उनका मकसद हमारा फायदा नहीं, बल्कि हमें सौदे करने के लिए उकसाना होता है। इसलिए उनकी सलाह पर आंख मूंदकर सौदे करना अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा है। बेहतर यही है कि हम खुद अपने नियम व सिस्टम विकसित करें और उसके आधार पर सौदे करें। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

दुनिया में कोई ट्रेडिंग रणनीति नहीं जो हर हाल में कामयाब हो। अच्छी से अच्छी रणनीति भी कुल मिलाकर 60% सफल और 40% विफल होती है। इसलिए माहौल को देखकर रणनीति को बदलते रहना होता है। फिलहाल निराशा का घटाटोप छा रहा है तो लांग के बजाय शॉर्ट करने की नीति सही रहेगी। लेकिन शॉर्ट सौदे आसान नहीं है क्योंकि इन्हें एफ एंड ओ सेगमेंट में ही किया जा सकता है। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने ब्याज दर में अपेक्षित कटौती कर दी। फिर भी शेयर बाज़ार चहकने के बजाय लुढ़क गया। निफ्टी 2.34% और सेंसेक्स 2.37% गिर गया। कारण बताया जा रहा है कि रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के आर्थिक विकास का अनुमान 7.8% से घटाकर 7.6% कर दिया है। दूसरे, मौसम विभाग का बयान आया कि मानसून इस बार औसत का 93% नहीं, बल्कि 88% रह सकता है। आशा पर निराशा भारी। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सनफार्मा के नतीजों पर रैनबैक्सी के विलय का बोझ पड़ना ही था तो नतीजों में कमज़ोरी स्वाभाविक थी। ऐसे में ट्रेडरों व निवेशकों में दो तरह की सोच चली। एक, कंपनी दो-तीन तिमाहियों बाद तेज़ी से बढ़ेगी। दूसरी यह कि विलय उस पर भारी पड़ेगा। दूसरी सोच बाज़ार में हावी हो गई तो उसका शेयर छह सालों की सबसे ज्यादा गिरावट का शिकार हो गया। यहीं पर स्टॉप-लॉस का अनुशासन काम आता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बहुत ही कम होता है कि विदेशी और देशी संस्थाएं एक ही दिशा में सौदे करें। अमूमन विदेशी बेचते हैं तो देशी खरीदते हैं और विदेशी खरीदते हैं तो देशी बेचते हैं। दोनों महारथी! फिर आखिर सही कौन? यकीनन बाज़ार की दिशा विदेशी संस्थाएं तय करती हैं। लेकिन गिरने पर खरीद और उठने पर बिक्री से मुनाफा कमाने का काम देशी संस्थाएं करती हैं, खासकर एलआईसी। म्यूचुअल फंड तो फिसड्डी हैं। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

स्मॉल-कैप कंपनियों के शेयर जमकर उछलते हैं तो गिरते भी हैं उतनी ही तेज़ी से। वहीं, मिड-कैप कंपनियों के साथ भी कमोबेश यही होता है। लेकिन मजबूत लार्ज-कैप कंपनियां अगर सही भाव पर पकड़ ली जाएं तो उनमें धीमी ही सही, मगर निरतंर वृद्धि होती रहती है। आज तथास्तु में ऐसी ही एक लार्ज-कैप कंपनी जिसके शेयर बीते तीन महीनों में 21% गिर चुके हैं। अभी इसमें निवेश करना लंबे समय में काफी लाभकारी साबित होगा।…और भीऔर भी